रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स या रिपोर्टर्स सां फ्रांतिए (आरएसएफ़) दुनिया की जानी-मानी संस्था है, यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिता की स्वतंत्रता की स्थिति पर सालाना रिपोर्ट जारी करती है.
भारत पिछले साल के मुक़ाबले दो पायदान नीचे गिरा है, भारत 138वें नंबर से खिसककर 140वें स्थान पर आ गया है, 2017 में भारत 136वें स्थान पर था यानी यह लगातार हो रही गिरावट है.
रिपोर्ट बताती है कि 2018 में भारत में कम-से-कम छह पत्रकार अपना काम करने की वजह से मारे गए. पूरी रिपोर्ट आप यहां पढ़ सकते हैं.
आरएसएफ़ का निष्कर्ष है, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक चुनाव से पहले पत्रकारों के ख़िलाफ़ बहुत आक्रामकता दिखा रहे हैं. हिंदुत्व के समर्थक राष्ट्रीय बहसों से उन सभी विचारों को मिटा देना चाहते हैं जिन्हें वे राष्ट्र विरोधी मानते हैं."
पत्रकारों की आवाज़ दबाए जाने के बारे में रिपोर्ट कहती है, "सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों के खिलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज किए जाते हैं, कुछ मामलों में तो राजद्रोह का केस दर्ज किया जाता है जिसमें आजीवन कारावास की सज़ा हो सकती है."
रिपोर्ट में कहा गया है, "उन पत्रकारों के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर संगठित तरीक़े से नफ़रत का अभियान चलाया जाता है जो ऐसे विषयों को उठाने की हिम्मत करते हैं जिनसे हिंदुत्व के समर्थकों को चिढ़ है. कई बार तो पत्रकारों को जान से मारने की धमकी दी जाती है. अगर पत्रकार महिला हो तो हमला और भी बुरा होता है."
महिला रिपोर्टरों की हालत पर भी संस्था ने गहरी चिंता जताई है, रिपोर्ट में कहा गया है, "#metoo के ज़रिए पता चला है कि महिला पत्रकारों को अपने दफ़्तर में किस तरह के माहौल में काम करना पड़ता है."
यह भी कहा गया है कि जिन क्षेत्रों को सरकार ने संवेदनशील घोषित कर दिया है, वहां से रिपोर्टिंग करना बेहद मुश्किल है. रिपोर्ट ने ख़ास तौर पर कश्मीर का ज़िक्र किया है, "विदेशी पत्रकारों के कश्मीर जाने पर रोक लगा दी गई है और वहां इंटरनेट अक्सर बंद कर दिया जाता है."
भारत में पत्रकारों के विरुद्ध सामान्य हिंसा के बारे में रिपोर्ट में कहा गया कि "पुलिस, माओवादी, अपराधी और भ्रष्ट राजनेताओं की हिंसा का सामना पत्रकारों को करना पड़ता है जिसकी वजह से वे आज़ादी से काम नहीं कर पाते."
क्या हालत है बाक़ी देशों में
प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स नॉर्वे पहले नंबर पर है, पहले दस देशों में ज़्यादातर उत्तरी यूरोप यानी स्कैंडेनेविया के हैं, इनमें न्यूज़ीलैंड और कनाडा भी काफ़ी ऊपर है. पत्रकारिता की स्वतंत्रता के मामले में भारत पड़ोसी देशों नेपाल (106) और श्रीलंका (126) से भी नीचे है.
अगर पाकिस्तान से तुलना करें तो वह भारत से सिर्फ़ दो पायदान नीचे, 142वें नंबर पर है. ब्रिटेन 33वें नंबर पर और अमरीका 48वें नंबर पर है.
प्रेस स्वतंत्रता के हिसाब से पहले दस देशों में एशिया या अफ़्रीका का एक भी देश नहीं है, ज़्यादातर देश यूरोप के हैं. सीरिया, सूडान, चीन, इरीट्रिया, उत्तर कोरिया और तुर्कमेनिस्तान अंतिम पांच में हैं.
Friday, April 19, 2019
Monday, April 15, 2019
कर्नाटकः निर्दलीय लड़ रही अभिनेत्री सुमलता जिनका मोदी ने किया समर्थन - ग्राउंड रिपोर्ट
बेंगलुरु से 150 किलोमीटर दूर सारंगी क़स्बे में उत्साह है. पहली बार वोट देने वाली दो लड़कियां एक भारी माला लिए खड़ी हैं.
वो एक स्वागत टीम का हिस्सा हैं जिनमें कई और महिलाएं शामिल हैं. हर घर के बाहर लोग खड़े हैं.
माहौल त्योहार जैसा है, ठीक वैसा ही जैसे दशकों पहले चुनावी माहौल हुआ करता था.
सब को इंतज़ार है सुमलता अंबरीश का जो इस चुनावी क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार हैं जिन्हें नरेंद्र मोदी का समर्थन हासिल है.
उनके प्रतिद्वंद्वी हैं 29 वर्षीय निखिल कुमारस्वामी जो मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के बेटे और राज्य के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के पोते हैं.
एक घंटे की देरी के बाद मोटर साइकिलों और वाहनों के एक लंबे क़ाफ़िले के साथ वो गांव में प्रवेश करती हैं.
पटाख़ों की आवाज़ों और फूलों की बौछार से उनका स्वागत किया जाता है.
वो अपनी गाड़ी पर ही खड़ी हो कर, चारों तरफ़ हाथ हिलाकर, अपने ज़ोरदार स्वागत का शुक्रिया अदा करती हैं.
सुमलता 250 के क़रीब बहुभाषी फ़िल्मों की अभिनेत्री रह चुकी हैं.
उससे भी बढ़ कर जो बात उनके पक्ष में जाती है वो ये कि उनके पति अंबरीश एक लोकप्रिय फ़िल्म स्टार थे जिनका देहांत छह महीने पहले ही हुआ है.
उन्होंने इस क्षेत्र का 1998 में जनता दल से और 1999 और 2004 में कांग्रेस पार्टी से लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया था.
इसीलिए इस चुनावी क्षेत्र के लोग 55 साल की सुमलता को यहाँ की बहु मानते हैं और उन्हें वही सम्मान देते हैं जो ये लोग उनके पति को दिया करते थे.
लेकिन सुमलता अपने प्रतिद्वंद्वी निखिल कुमारस्वामी की वंशावली से थोड़ा घबराई हुई ज़रूर हैं.
वो कहती हैं, "मेरे प्रतिद्वंद्वी मुख्यमंत्री के बेटे हैं और सत्ताधारी दल के हैं. ज़िले में जेडीएस के आठ विधायक हैं और उनमें से तीन मंत्री हैं."
"इसलिए मैं एक कठिन चुनौती का सामना कर रही हूं."
कर्नाटक का चुनावी इतिहास भी सुमलता के ख़िलाफ़ है. राज्य ने 1951 से अब तक केवल दो निर्दलीय उम्मीदवारों को जिताया है.
सुमलता इससे वाक़िफ़ हैं. वो कहती हैं, "हो सकता है मैं इतिहास बदल दूँ."
सुमलता की स्थिति उस समय थोड़ी मज़बूत हुई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मैसूर में एक भाषण के दौरान उनका नाम लेकर उनका समर्थन किया.
बीजेपी ने यहाँ से कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं किया है और पार्टी के कार्यकर्ता निंगराज कहते हैं कि उनकी पार्टी उनको पूरा सहयोग दे रही है.
"नरेंद्र मोदी हाल ही में मैसूर आए थे और हमसे सुमलता अंबरीश का समर्थन करने को कहा था. हम उनके साथ हैं. येदुयरप्पा ने भी हमें उनका समर्थन करने का संदेश दिया है."
दोनों दलों के नेताओं के बीच तालमेल तो है लेकिन जो बात सुमलता के पक्ष में जाती है वो है ज़मीनी सतह पर इस गठबंधन के कार्यकर्ताओं के बीच टकराव.
मंड्या के इस चुनावी क्षेत्र से 2014 और 2018 के उपचुनाव में जेडीएस की जीत हुई थी. लेकिन कांग्रेस ने कई बार ये सीट जीती है.
कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के खुले विद्रोह के दो कारण हैं.
एक ये कि कार्यकर्ता निखिल को भाई-भतीजावाद के उम्मीदवार की तरह देखते हैं जिसका राजनीति में कोई अनुभव नहीं है.
और दूसरे अंबरीश के मरने के बाद उनकी विधवा के प्रति ज़बर्दस्त सहानुभूति है और वो चाहते थे कि उनकी श्रद्धांजलि के रूप में कांग्रेस सुमलता को टिकट देती.
वो एक स्वागत टीम का हिस्सा हैं जिनमें कई और महिलाएं शामिल हैं. हर घर के बाहर लोग खड़े हैं.
माहौल त्योहार जैसा है, ठीक वैसा ही जैसे दशकों पहले चुनावी माहौल हुआ करता था.
सब को इंतज़ार है सुमलता अंबरीश का जो इस चुनावी क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार हैं जिन्हें नरेंद्र मोदी का समर्थन हासिल है.
उनके प्रतिद्वंद्वी हैं 29 वर्षीय निखिल कुमारस्वामी जो मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के बेटे और राज्य के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के पोते हैं.
एक घंटे की देरी के बाद मोटर साइकिलों और वाहनों के एक लंबे क़ाफ़िले के साथ वो गांव में प्रवेश करती हैं.
पटाख़ों की आवाज़ों और फूलों की बौछार से उनका स्वागत किया जाता है.
वो अपनी गाड़ी पर ही खड़ी हो कर, चारों तरफ़ हाथ हिलाकर, अपने ज़ोरदार स्वागत का शुक्रिया अदा करती हैं.
सुमलता 250 के क़रीब बहुभाषी फ़िल्मों की अभिनेत्री रह चुकी हैं.
उससे भी बढ़ कर जो बात उनके पक्ष में जाती है वो ये कि उनके पति अंबरीश एक लोकप्रिय फ़िल्म स्टार थे जिनका देहांत छह महीने पहले ही हुआ है.
उन्होंने इस क्षेत्र का 1998 में जनता दल से और 1999 और 2004 में कांग्रेस पार्टी से लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया था.
इसीलिए इस चुनावी क्षेत्र के लोग 55 साल की सुमलता को यहाँ की बहु मानते हैं और उन्हें वही सम्मान देते हैं जो ये लोग उनके पति को दिया करते थे.
लेकिन सुमलता अपने प्रतिद्वंद्वी निखिल कुमारस्वामी की वंशावली से थोड़ा घबराई हुई ज़रूर हैं.
वो कहती हैं, "मेरे प्रतिद्वंद्वी मुख्यमंत्री के बेटे हैं और सत्ताधारी दल के हैं. ज़िले में जेडीएस के आठ विधायक हैं और उनमें से तीन मंत्री हैं."
"इसलिए मैं एक कठिन चुनौती का सामना कर रही हूं."
कर्नाटक का चुनावी इतिहास भी सुमलता के ख़िलाफ़ है. राज्य ने 1951 से अब तक केवल दो निर्दलीय उम्मीदवारों को जिताया है.
सुमलता इससे वाक़िफ़ हैं. वो कहती हैं, "हो सकता है मैं इतिहास बदल दूँ."
सुमलता की स्थिति उस समय थोड़ी मज़बूत हुई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मैसूर में एक भाषण के दौरान उनका नाम लेकर उनका समर्थन किया.
बीजेपी ने यहाँ से कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं किया है और पार्टी के कार्यकर्ता निंगराज कहते हैं कि उनकी पार्टी उनको पूरा सहयोग दे रही है.
"नरेंद्र मोदी हाल ही में मैसूर आए थे और हमसे सुमलता अंबरीश का समर्थन करने को कहा था. हम उनके साथ हैं. येदुयरप्पा ने भी हमें उनका समर्थन करने का संदेश दिया है."
दोनों दलों के नेताओं के बीच तालमेल तो है लेकिन जो बात सुमलता के पक्ष में जाती है वो है ज़मीनी सतह पर इस गठबंधन के कार्यकर्ताओं के बीच टकराव.
मंड्या के इस चुनावी क्षेत्र से 2014 और 2018 के उपचुनाव में जेडीएस की जीत हुई थी. लेकिन कांग्रेस ने कई बार ये सीट जीती है.
कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के खुले विद्रोह के दो कारण हैं.
एक ये कि कार्यकर्ता निखिल को भाई-भतीजावाद के उम्मीदवार की तरह देखते हैं जिसका राजनीति में कोई अनुभव नहीं है.
और दूसरे अंबरीश के मरने के बाद उनकी विधवा के प्रति ज़बर्दस्त सहानुभूति है और वो चाहते थे कि उनकी श्रद्धांजलि के रूप में कांग्रेस सुमलता को टिकट देती.
Monday, April 8, 2019
लोकसभा चुनाव 2019: आँकड़ों की बिसात पर कितने मज़बूत हैं मोदी? - नज़रिया
कुछ महीनों पहले तक ऐसा लग रहा था कि बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को कांग्रेस से चुनौती मिल सकती है. इसलिए भी क्योंकि पिछले साल कांग्रेस ने तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव जीते थे जिससे लगा कि कांग्रेस उबर रही है.
लेकिन पुलवामा हमले के बाद अब 2019 का समीकरण बदलता नज़र आ है. राष्ट्रवाद के घोड़े पर सवार बीजेपी ने पुलवामा के बाद ये चुनावी समीकरण अपने पक्ष में कर लिया है.
कम-से-कम हिंदी राज्यों में तो उसने अपने नुकसान को काफ़ी कम कर लिया है और कांग्रेस के साथ-साथ दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों को भी अपनी रणनीति पर दोबारा सोचने पर मजबूर किया है.
सवाल पहले ये था कि क्या बीजेपी 2019 में वापसी कर पाएगी? पुलवामा हमले के बाद अब सवाल ये है कि बीजेपी 2019 में कितनी सीटें जीत पाएगी?
पुलवामा हमले से पहले भी बीजेपी 2019 के चुनावों की रेस में आगे थी लेकिन पुलवामा के बाद बीजेपी हिंदी राज्यों में कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों से भी थोड़ा आगे निकल गई है.
बालाकोट एयरस्ट्राइक से बीजेपी सरकार की छवि भी बनी कि ये सरकार पाकिस्तान को जवाब दे सकती है.
साथ ही बीजेपी को इस बात से भी फ़ायदा हो रहा है कि लोगों को नरेंद्र मोदी का विकल्प नज़र नहीं आ रहा. पुलवामा के बाद मोदी और मज़बूत दिखाई दे रहे हैं और उनकी लोकप्रियता जो कम होती दिखाई दे रही थी, उसे फिर से उछाल मिल गया.
हालांकि, इससे अलग भी एक मत है कि अगर अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोकप्रिय नेता को 2004 में कमज़ोर कांग्रेस और बंटा हुआ विपक्ष हरा सकते हैं तो क्या लोकप्रिय नरेंद्र मोदी को 2019 में नहीं हराया जा सकता?
कोई पार्टी ये दावा नहीं कर सकती कि वो अजेय है और यही बात बीजेपी पर भी लागू होती है. लेकिन 2019 को 2004 से तुलना नहीं कर सकते क्योंकि इन दोनों चुनावों में कांग्रेस का वोट बेस अलग है.
जब 2004 में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा तो उसके पास 28% वोट थे और अब कांग्रेस का वोट 19.6% ही रह गया है.
अगर कांग्रेस 6-7 फीसदी की बढ़ोतरी कर भी लेती है तब भी 100 सीटों से ज़्यादा नहीं मिल पाएंगी.
अगर किसी लोकप्रिय सरकार को हराना है जैसे कि बीजेपी सरकार तो विपक्ष को सत्ताधारी पार्टी से ज़्यादा मज़बूत नज़र आना होगा और अगर कोई एक विपक्षी पार्टी बहुत मज़बूत नहीं हैं तो सत्ताधारी पार्टी को हराने के लिए विपक्षी पार्टियों को एक साथ आना होगा.
फिलहाल जो परिस्थिति है उसमें इन दोनों में से कुछ नज़र नहीं आ रहा. कांग्रेस उत्तर प्रदेश में महागठबंधन नहीं बना पाई और कई कोशिशों के बाद भी आज तक आम आदमी पार्टी से भी गठबंधन नहीं कर पाई है.
कांग्रेस अकेले बीजेपी को इस समय नहीं हरा सकती. विपक्ष साथ आता तो ज़रूर मोदी के लिए एक चुनौती होता लेकिन फिर भी बीजेपी को 200 सीटों से नीचे ना ला पाता.
पहले राष्ट्रीय स्थिति की बात करते हैं और उसके बाद राज्यों की. 2014 लोकसभा चुनावों में बीजेपी को कई क्षेत्रों में बड़े अंतर से जीत मिली. बीजेपी को इन सीटों पर तभी हराया जा सकता है जब बड़ा नकारात्मक वोट विपक्ष के खाते में स्विंग हो.
बीजेपी ने 42 लोकसभा सीटों पर तीन लाख वोटों से भी ज़्यादा के अंतर से जीत मिली थी और 75 लोकसभा सीटों पर दो लाख से ज़्यादा के अंतर से.
38 लोकसभा सीटों पर डेढ लाख वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी और 52 लोकसभा सीटों पर 1 लाख से ज़्यादा वोटों के अंतर से.
2019 में विपक्षी पार्टियों के लिए इतने अंतर को पाटना आसान नहीं होगा. ये तभी संभव है अगर सत्ताधारी बीजेपी के ख़िलाफ़ लोगों में गुस्सा हो.
पहले लोगों में बीजेपी को लेकर गुस्सा था लेकिन पुलवामा के बाद अब स्थिति बदल गई है. विपक्षी पार्टियों के लिए इन वोटों को अपने पक्ष में करना मुश्किल हो सकता है.
2019 में अलग-अलग तरह के मुक़ाबले पर नज़र डालते हैं और देखते हैं कि बीजेपी 2019 में कैसा प्रदर्शन करेगी.
ऐसा माना जा रहा है कि उन हिंदीभाषी राज्यों में बीजेपी को नुक़सान हो सकता है जहां मुक़ाबला दोतरफ़ा है.
ये सही है कि हिंदीभाषी राज्यों में बीजेपी अपने 2014 के प्रदर्शन से बेहतर नहीं कर सकती जहां दो-तरफ़ा मुक़ाबला है लेकिन ये भी सच है कि बीजेपी को गुजरात, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में ज़्यादा नुक़सान नहीं होगा बशर्ते कुछ नाटकीय मोड़ ना आ जाए.
बेशक मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में हार के बाद भी बीजेपी मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस से थोड़ा फ़ायदे में है.
अगर हम इन विधानसभा चुनावों के वोट को संसदीय चुनाव में तब्दील करें तो मध्य प्रदेश में बीजेपी 18 लोकसभा सीटों पर आगे है और कांग्रेस 11 सीटों पर.
राजस्थान में विधानसभा वोटों को संसदीय चुनाव के हिसाब से देखें तो बीजेपी 13 सीटों पर आगे है और कांग्रेस 12.
सिर्फ़ छत्तीसगढ़ में कांग्रेस निर्णायक स्थिति में है. हालांकि यहां भी पुलवामा के बाद बीजेपी का वोट शेयर बढ़ने की संभावना है.
अगर हम सोचें कि कांग्रेस का वोट शेयर 2014 की तुलना में 2019 में बढ़ेगा तो कांग्रेस को दोतरफ़ा चुनावों का फ़ायदा उठाने के लिए बहुत ज़्यादा वोट स्विंग करना पड़ेगा. सिर्फ 5-6% बीजेपी से कांग्रेस में आने से बीजेपी को इन राज्यों में ज़्यादा फर्क नहीं पड़ेगा और कांग्रेस के लिए भी इतना वोट शिफ्ट करना आसान नहीं होगा.
ऐसे कई राज्य हैं जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, झारखंड, पंजाब, जम्मू कश्मीर और दिल्ली जहां बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा रहा. इन राज्यों में बीजेपी ने या तो क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन किया और जहां क्षेत्रीय पार्टियां बंटी हुई थी तो बीजेपी विरोधी वोट भी बंट गईं और उसका फ़ायदा बीजेपी को मिला.
ये सही है कि विपक्षी पार्टियों का गठबंधन बीजेपी को कई राज्यों में बैकफ़ुट पर ला सकता है जैसे उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, झारखंड, हरियाणा, महाराष्ट्र. बिहार में विपक्ष का गठबंधन एनडीए का नुक़सान नहीं कर सकता.
कांग्रेस ने कर्नाटक, तमिलनाडु, झारखंड, महाराष्ट्र, बिहार में गठबंधन किया है लेकिन ये बीजेपी को चुनौती देने के लिए काफ़ी नहीं.
पश्चिम बंगाल, ओडिशा में 2014 लोकसभा चुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था लेकिन 2019 में बीजेपी के पास यहां मज़बूत होने का अच्छा मौक़ा है अगर 2014 जैसे ही परिस्थितियां रही तो यानी कि विपक्ष बंटा हुआ रहे तो.
पिछले कुछ सालों के सर्वे इसी तरफ़ इशारा कर रहे हैं. सर्वे कहते हैं कि बीजेपी पिछले कुछ सालों में इन राज्यों में पहले से मज़बूत हुई है. विपक्ष गठबंधन नहीं करेगा तो बीजेपी के लिए इन राज्यों में राह आसान होगी.
दक्षिण में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में बीजेपी की स्थिति करीब-करीब 2014 जैसी ही है सिर्फ केरल में बीजेपी का समर्थन बढ़ा है लेकिन लोकसभा सीटें जीतने के लिए काफ़ी नहीं है.
लेकिन पुलवामा हमले के बाद अब 2019 का समीकरण बदलता नज़र आ है. राष्ट्रवाद के घोड़े पर सवार बीजेपी ने पुलवामा के बाद ये चुनावी समीकरण अपने पक्ष में कर लिया है.
कम-से-कम हिंदी राज्यों में तो उसने अपने नुकसान को काफ़ी कम कर लिया है और कांग्रेस के साथ-साथ दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों को भी अपनी रणनीति पर दोबारा सोचने पर मजबूर किया है.
सवाल पहले ये था कि क्या बीजेपी 2019 में वापसी कर पाएगी? पुलवामा हमले के बाद अब सवाल ये है कि बीजेपी 2019 में कितनी सीटें जीत पाएगी?
पुलवामा हमले से पहले भी बीजेपी 2019 के चुनावों की रेस में आगे थी लेकिन पुलवामा के बाद बीजेपी हिंदी राज्यों में कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों से भी थोड़ा आगे निकल गई है.
बालाकोट एयरस्ट्राइक से बीजेपी सरकार की छवि भी बनी कि ये सरकार पाकिस्तान को जवाब दे सकती है.
साथ ही बीजेपी को इस बात से भी फ़ायदा हो रहा है कि लोगों को नरेंद्र मोदी का विकल्प नज़र नहीं आ रहा. पुलवामा के बाद मोदी और मज़बूत दिखाई दे रहे हैं और उनकी लोकप्रियता जो कम होती दिखाई दे रही थी, उसे फिर से उछाल मिल गया.
हालांकि, इससे अलग भी एक मत है कि अगर अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोकप्रिय नेता को 2004 में कमज़ोर कांग्रेस और बंटा हुआ विपक्ष हरा सकते हैं तो क्या लोकप्रिय नरेंद्र मोदी को 2019 में नहीं हराया जा सकता?
कोई पार्टी ये दावा नहीं कर सकती कि वो अजेय है और यही बात बीजेपी पर भी लागू होती है. लेकिन 2019 को 2004 से तुलना नहीं कर सकते क्योंकि इन दोनों चुनावों में कांग्रेस का वोट बेस अलग है.
जब 2004 में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा तो उसके पास 28% वोट थे और अब कांग्रेस का वोट 19.6% ही रह गया है.
अगर कांग्रेस 6-7 फीसदी की बढ़ोतरी कर भी लेती है तब भी 100 सीटों से ज़्यादा नहीं मिल पाएंगी.
अगर किसी लोकप्रिय सरकार को हराना है जैसे कि बीजेपी सरकार तो विपक्ष को सत्ताधारी पार्टी से ज़्यादा मज़बूत नज़र आना होगा और अगर कोई एक विपक्षी पार्टी बहुत मज़बूत नहीं हैं तो सत्ताधारी पार्टी को हराने के लिए विपक्षी पार्टियों को एक साथ आना होगा.
फिलहाल जो परिस्थिति है उसमें इन दोनों में से कुछ नज़र नहीं आ रहा. कांग्रेस उत्तर प्रदेश में महागठबंधन नहीं बना पाई और कई कोशिशों के बाद भी आज तक आम आदमी पार्टी से भी गठबंधन नहीं कर पाई है.
कांग्रेस अकेले बीजेपी को इस समय नहीं हरा सकती. विपक्ष साथ आता तो ज़रूर मोदी के लिए एक चुनौती होता लेकिन फिर भी बीजेपी को 200 सीटों से नीचे ना ला पाता.
पहले राष्ट्रीय स्थिति की बात करते हैं और उसके बाद राज्यों की. 2014 लोकसभा चुनावों में बीजेपी को कई क्षेत्रों में बड़े अंतर से जीत मिली. बीजेपी को इन सीटों पर तभी हराया जा सकता है जब बड़ा नकारात्मक वोट विपक्ष के खाते में स्विंग हो.
बीजेपी ने 42 लोकसभा सीटों पर तीन लाख वोटों से भी ज़्यादा के अंतर से जीत मिली थी और 75 लोकसभा सीटों पर दो लाख से ज़्यादा के अंतर से.
38 लोकसभा सीटों पर डेढ लाख वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी और 52 लोकसभा सीटों पर 1 लाख से ज़्यादा वोटों के अंतर से.
2019 में विपक्षी पार्टियों के लिए इतने अंतर को पाटना आसान नहीं होगा. ये तभी संभव है अगर सत्ताधारी बीजेपी के ख़िलाफ़ लोगों में गुस्सा हो.
पहले लोगों में बीजेपी को लेकर गुस्सा था लेकिन पुलवामा के बाद अब स्थिति बदल गई है. विपक्षी पार्टियों के लिए इन वोटों को अपने पक्ष में करना मुश्किल हो सकता है.
2019 में अलग-अलग तरह के मुक़ाबले पर नज़र डालते हैं और देखते हैं कि बीजेपी 2019 में कैसा प्रदर्शन करेगी.
ऐसा माना जा रहा है कि उन हिंदीभाषी राज्यों में बीजेपी को नुक़सान हो सकता है जहां मुक़ाबला दोतरफ़ा है.
ये सही है कि हिंदीभाषी राज्यों में बीजेपी अपने 2014 के प्रदर्शन से बेहतर नहीं कर सकती जहां दो-तरफ़ा मुक़ाबला है लेकिन ये भी सच है कि बीजेपी को गुजरात, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में ज़्यादा नुक़सान नहीं होगा बशर्ते कुछ नाटकीय मोड़ ना आ जाए.
बेशक मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में हार के बाद भी बीजेपी मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस से थोड़ा फ़ायदे में है.
अगर हम इन विधानसभा चुनावों के वोट को संसदीय चुनाव में तब्दील करें तो मध्य प्रदेश में बीजेपी 18 लोकसभा सीटों पर आगे है और कांग्रेस 11 सीटों पर.
राजस्थान में विधानसभा वोटों को संसदीय चुनाव के हिसाब से देखें तो बीजेपी 13 सीटों पर आगे है और कांग्रेस 12.
सिर्फ़ छत्तीसगढ़ में कांग्रेस निर्णायक स्थिति में है. हालांकि यहां भी पुलवामा के बाद बीजेपी का वोट शेयर बढ़ने की संभावना है.
अगर हम सोचें कि कांग्रेस का वोट शेयर 2014 की तुलना में 2019 में बढ़ेगा तो कांग्रेस को दोतरफ़ा चुनावों का फ़ायदा उठाने के लिए बहुत ज़्यादा वोट स्विंग करना पड़ेगा. सिर्फ 5-6% बीजेपी से कांग्रेस में आने से बीजेपी को इन राज्यों में ज़्यादा फर्क नहीं पड़ेगा और कांग्रेस के लिए भी इतना वोट शिफ्ट करना आसान नहीं होगा.
ऐसे कई राज्य हैं जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, झारखंड, पंजाब, जम्मू कश्मीर और दिल्ली जहां बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा रहा. इन राज्यों में बीजेपी ने या तो क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन किया और जहां क्षेत्रीय पार्टियां बंटी हुई थी तो बीजेपी विरोधी वोट भी बंट गईं और उसका फ़ायदा बीजेपी को मिला.
ये सही है कि विपक्षी पार्टियों का गठबंधन बीजेपी को कई राज्यों में बैकफ़ुट पर ला सकता है जैसे उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, झारखंड, हरियाणा, महाराष्ट्र. बिहार में विपक्ष का गठबंधन एनडीए का नुक़सान नहीं कर सकता.
कांग्रेस ने कर्नाटक, तमिलनाडु, झारखंड, महाराष्ट्र, बिहार में गठबंधन किया है लेकिन ये बीजेपी को चुनौती देने के लिए काफ़ी नहीं.
पश्चिम बंगाल, ओडिशा में 2014 लोकसभा चुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था लेकिन 2019 में बीजेपी के पास यहां मज़बूत होने का अच्छा मौक़ा है अगर 2014 जैसे ही परिस्थितियां रही तो यानी कि विपक्ष बंटा हुआ रहे तो.
पिछले कुछ सालों के सर्वे इसी तरफ़ इशारा कर रहे हैं. सर्वे कहते हैं कि बीजेपी पिछले कुछ सालों में इन राज्यों में पहले से मज़बूत हुई है. विपक्ष गठबंधन नहीं करेगा तो बीजेपी के लिए इन राज्यों में राह आसान होगी.
दक्षिण में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में बीजेपी की स्थिति करीब-करीब 2014 जैसी ही है सिर्फ केरल में बीजेपी का समर्थन बढ़ा है लेकिन लोकसभा सीटें जीतने के लिए काफ़ी नहीं है.
Thursday, April 4, 2019
रिकॉर्ड 35 बिलियन डॉलर पर अमेज़ॉन के बॉस बेज़ोस और पत्नी मैकेंज़ी के बीच तलाक़ पर बनी सहमति
दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति अमेज़ॉन के बॉस जेफ़ बेज़ोस और उनकी पत्नी मैकेंज़ी के बीच रिकॉर्ड 35 बिलियन डॉलर (क़रीब 2420 अरब रुपये) के समझौते पर तलाक़ को लेकर सहमति बन गई है.
तलाक़ सहमति के मुताबिक अब 25 साल पुरानी रिटेल कंपनी अमेज़ॉन में मैकेंज़ी की हिस्सेदारी 4 फ़ीसदी ही रहेगी.
साथ ही अब मैकेंज़ी वाशिंगटन पोस्ट न्यूज़पेपर और बेज़ोस की स्पेस ट्रैवल फर्म ब्लू ओरिजिन में भी अपनी दिलचस्पी छोड़ देंगी.
बेज़ोस और मैकेंज़ी के बीत 35 बिलियन डॉलर राशि पर बने समझौते ने फ़्रांस में जन्मे अमरीकी अरबपति एलेक वाइल्डेनस्टाइन और उनकी पूर्व पत्नी जोसेलीन वाइल्डनेस्टीन के बीच 3.8 बिलियन डॉलर के समझौते को बहुत पीछे छोड़ दिया है.
मैकेंज़ी ने एक ट्वीट के जरिए यह घोषणा की. उन्होंने इसी महीने ट्विटर जॉइन किया है और यह उनका पहला और एकमात्र ट्वीट है.
इस तलाक़ समझौते से पहले अमेज़ॉन में मैकेंज़ी की 16.3 फ़ीसदी हिस्सेदारी थी. यानी उनकी 75 फ़ीसदी हिस्सेदारी बेज़ोस अपने पास रखेंगे.
बेज़ोस ने 1994 में अमेज़ॉन की स्थापना की और मैकेंज़ी ने इस कंपनी की पहली सदस्य के रूप में काम किया था. दोनों के चार बच्चे हैं.
आज अमेज़ॉन एक बहुत बड़ी ऑनलाइन कंपनी है. फोर्ब्स के मुताबिक बीते वर्ष अमेज़ॉन ने 232.8 बिलियन डॉलर (लगभग 16,010 अरब रुपये) का कारोबार किया और उनके परिवार ने 131 बिलियन डॉलर (क़रीब 9,109 अरब रुपये) की कमाई की.
मैकेंजी एक सफल उपन्याकार भी हैं. उन्होंने दो किताबें 'द टेस्टिंग ऑफ़ लूथर अलब्राइट' और 'ट्रैप्स' लिखी हैं और पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता लेखक टोनी मौरिसन ने उन्हें प्रिंस्टन विश्वविद्यालय में पढ़ाया था. उन्होंने (मौरिसन ने) एक बार कहा भी था कि वो (मैकेंज़ी) उनके सबसे बेहतरीन छात्रों में से एक थीं. उन्होंने मैकेंज़ी के बारे में कहा था, "क्रिएटिव राइटिंग की क्लास में मेरी अब तक की सर्वश्रेष्ठ छात्र."
उधर जेफ़ बेज़ोस की फॉक्स टीवी की पूर्व होस्ट लॉरेन सांचेज़ के साथ कथित रिलेशनशिप की चर्चाएं चल रही हैं.
जब बेज़ोस ने जनवरी में मैकेंज़ी से तलाक़ की घोषणा की थी तो एक अमरीकी टैबलॉयड ने सांचेज़ के साथ बेज़ोस के विवाहेतर संबंध और प्राइवेट मैसेज को छापा था.
बेज़ोस ने इस हेल्थ और फिटनेस मैगज़ीन, अमरीकन मीडिया इनकॉर्पोरेशन, पर ब्लैकमेल का आरोप लगाया था. हालांकि प्रकाशकों ने उनके इस दावे को नकार दिया था.
तलाक़ सहमति के मुताबिक अब 25 साल पुरानी रिटेल कंपनी अमेज़ॉन में मैकेंज़ी की हिस्सेदारी 4 फ़ीसदी ही रहेगी.
साथ ही अब मैकेंज़ी वाशिंगटन पोस्ट न्यूज़पेपर और बेज़ोस की स्पेस ट्रैवल फर्म ब्लू ओरिजिन में भी अपनी दिलचस्पी छोड़ देंगी.
बेज़ोस और मैकेंज़ी के बीत 35 बिलियन डॉलर राशि पर बने समझौते ने फ़्रांस में जन्मे अमरीकी अरबपति एलेक वाइल्डेनस्टाइन और उनकी पूर्व पत्नी जोसेलीन वाइल्डनेस्टीन के बीच 3.8 बिलियन डॉलर के समझौते को बहुत पीछे छोड़ दिया है.
मैकेंज़ी ने एक ट्वीट के जरिए यह घोषणा की. उन्होंने इसी महीने ट्विटर जॉइन किया है और यह उनका पहला और एकमात्र ट्वीट है.
इस तलाक़ समझौते से पहले अमेज़ॉन में मैकेंज़ी की 16.3 फ़ीसदी हिस्सेदारी थी. यानी उनकी 75 फ़ीसदी हिस्सेदारी बेज़ोस अपने पास रखेंगे.
बेज़ोस ने 1994 में अमेज़ॉन की स्थापना की और मैकेंज़ी ने इस कंपनी की पहली सदस्य के रूप में काम किया था. दोनों के चार बच्चे हैं.
आज अमेज़ॉन एक बहुत बड़ी ऑनलाइन कंपनी है. फोर्ब्स के मुताबिक बीते वर्ष अमेज़ॉन ने 232.8 बिलियन डॉलर (लगभग 16,010 अरब रुपये) का कारोबार किया और उनके परिवार ने 131 बिलियन डॉलर (क़रीब 9,109 अरब रुपये) की कमाई की.
मैकेंजी एक सफल उपन्याकार भी हैं. उन्होंने दो किताबें 'द टेस्टिंग ऑफ़ लूथर अलब्राइट' और 'ट्रैप्स' लिखी हैं और पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता लेखक टोनी मौरिसन ने उन्हें प्रिंस्टन विश्वविद्यालय में पढ़ाया था. उन्होंने (मौरिसन ने) एक बार कहा भी था कि वो (मैकेंज़ी) उनके सबसे बेहतरीन छात्रों में से एक थीं. उन्होंने मैकेंज़ी के बारे में कहा था, "क्रिएटिव राइटिंग की क्लास में मेरी अब तक की सर्वश्रेष्ठ छात्र."
उधर जेफ़ बेज़ोस की फॉक्स टीवी की पूर्व होस्ट लॉरेन सांचेज़ के साथ कथित रिलेशनशिप की चर्चाएं चल रही हैं.
जब बेज़ोस ने जनवरी में मैकेंज़ी से तलाक़ की घोषणा की थी तो एक अमरीकी टैबलॉयड ने सांचेज़ के साथ बेज़ोस के विवाहेतर संबंध और प्राइवेट मैसेज को छापा था.
बेज़ोस ने इस हेल्थ और फिटनेस मैगज़ीन, अमरीकन मीडिया इनकॉर्पोरेशन, पर ब्लैकमेल का आरोप लगाया था. हालांकि प्रकाशकों ने उनके इस दावे को नकार दिया था.
Subscribe to:
Comments (Atom)