Monday, December 31, 2018

मोदी सिर्फ़ नेहरू जैकेट पहनकर नेहरू नहीं बन सकते': प्रेस रिव्यू

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल ने शनिवार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने उन सभी वादों को पूरा करने में विफल रहे हैं जो उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों के पहले किए थे.

गुजरात के साबरकांठा में एक रैली को संबोधित करते हुए पटेल ने कहा, "जब आप झूठे वादे करके और झूठ फैलाकर 2014 में सत्ता में आए तो आपने नहीं सोचा होगा कि आप केवल चार साल में अलोकप्रिय हो जाएंगे. लोगों का अब बीजेपी से मोहभंग हो गया है. इसलिए कांग्रेस तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव जीती."

पटेल ने कहा, "जब 2014 में आप सत्ता में आए तो आपने सोचा कि आप हमेशा शासन करेंगे. यह आपका घमंड था. आपने यह एहसास नहीं किया कि अगर जनता आपको सत्ता में ला सकती है तो वह आपको बाहर भी कर सकती है."

मोदी पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा, "आप (मोदी) केवल 'नेहरू जैकेट' पहनने से जवाहर लाल नेहरू नहीं बन सकते. इसी तरह आप विदेशी दौरों पर जाकर इंदिरा गांधी भी नहीं बन सकते. आप डिजाइनर जैकेट और कुर्ते पहनने से राजीव गांधी नहीं बन सकते. ऐसे नेताओं की जमात में शामिल होने के लिए, आपको उनकी तरह त्याग करना होता है. क्या आपमें ऐसा करने का साहस है?"

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक सांसद और कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा है कि उनकी पार्टी मौजूदा स्वरूप में तीन तलाक़ विधेयक को राज्यसभा में पास नहीं होने देगी. उन्होंने कहा कि इसके लिए उन सभी दलों का साथ लिया जाएगा जिनके साथ मिलाकर इस विधेयक को गिराया जा सके.

उन्होंने कहा कि लोकसभा में जब यह विधेयक पेश किया गया, तब 10 विपक्षी पार्टियां खुलकर एकसाथ आई थीं. यहाँ तक कि कई मुद्दों पर सरकार का समर्थन करने वाली अन्नाद्रमुक और तृणमूल कांग्रेस ने भी इसका विरोध किया था.

लोकसभा ने गुरुवार को मुस्लिम महिला (विवाह संरक्षण अधिकार) विधेयक 2018 को मंज़ूरी दे दी थी. इस विधेयक के अगले हफ्ते राज्यसभा में पेश होने की उम्मीद है.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक पाकिस्तान ने करतारपुर कॉरिडोर में आने वाले भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए 14 सिफारिशें की हैं.

पिछले महीने भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने इस कॉरिडोर के अपने-अपने क्षेत्र में निर्माण की आधारशिला रखी थी. सिफ़ारिशों के तहत ग्रुप में कम-से-कम 15 श्रद्धालु हों, उन्हें अपने पास वैध पासपोर्ट, प्रासंगिक सुरक्षा निकासी दस्तावेज रखने होगा. साथ ही भारत को तीर्थयात्रियों के आने की सूचना तीन दिन पहले देनी होगी.

परमिट सिर्फ़ करतारपुर की यात्रा के लिए जारी किया जाएगा. एक दिन में 500 से अधिक तीर्थयात्रियों को परमिट नहीं दिया जाएगा. साथ ही करतारपुर गलियारा सुबह 8 से शाम 5 बजे तक खुला रहेगा.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक महाराष्ट्र सरकार ने आदेश जारी कर मुंबई में 31 दिसंबर की रात को पब, बार, होटल खुले रखने को कहा है, ताकि लोग नए साल पर पार्टी वगैरह कर सकें.

31 दिसंबर की शाम को शहरों में लोग पार्टी करते हैं और नए साल का स्वागत करते हैं. ऐसे में अक्सर लोगों की मांग रहती है कि देर तक होटल और बार खुले रहें.

मुंबई पुलिस के डीसीपी और पीआरओ मंजूनाथ सिंगे ने बताया है कि 31 दिसंबर की रात मुंबई में 40 हज़ार सुरक्षाकर्मी तैनात किए जाएंगे, ताकि किसी भी गड़बड़ी की आशंका को खत्म किया जा सके.

Wednesday, December 26, 2018

सुरक्षा में फेल, पतंजलि ने कैंसिल की किंभो ऐप की रिलॉन्चिंग

इस साल की शुरुआत में बाबा रामदेव के पतंजलि ब्रांड ने अपने नए सोशल मैसेजिंग ऐप किंभो के साथ टेक की दुनिया में कदम रखा था. अब दो बार असफल होने के बाद कंपनी ने फिलहाल इस ऐप को रिलॉन्च करने का इरादा छोड़ दिया है. ये जानकारी एक रिपोर्ट के हवाले से मिली है.

द प्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अदिति कमल का साथ छोड़ने के बाद पतंजलि ने नोएडा बेस्ड ऐप मेकिंग फर्म सोशल रिवोल्यूशन मीडिया एंड रिसर्च प्राइवेट लिमिटेड के साथ साझेदारी की थी. आपको बता दें पतंजलि द्वारा मैसेजिंग प्लेटफॉर्म उतारने का आइडिया अदिति कमल का ही था.

मई और अगस्त में किंभो ऐप को दो बार लॉन्च किया गया. लेकिन दोनों ही लॉन्च असफल रहे, क्योंकि ये सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स को पसंद नहीं आए. इसके बाद कंपनी ने फिलहाल के लिए ऐप को फिर से लॉन्च करने का इरादा छोड़ दिया है.

पतंजलि आयुर्वेद के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर आचार्य बालकृष्ण ने पब्लिकेशन से कहा कि हम टेक्निकल तरीके से परिपक्व और बेहद सिक्योर ऐप लॉन्च करना चाहते थे. हालांकि अभी हम किए गए काम से संतुष्ट नहीं हैं. हमने फिलहाल ऐप लॉन्च करने का आइडिया छोड़ दिया है क्योंकि हम आधा-अधूरा तैयार प्रोडक्ट बाजार में नहीं उतारना चाहते.

उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान में, हम नए प्रोजेक्ट्स के साथ काफी व्यस्त हैं और मुझे नहीं लगता है कि हमारे पास किम्भो में आगे लगाने के लिए समय और संसाधन हैं. फिलहाल हमने इस प्रोजेक्ट को साइड रख दिया है और इसकी दोबारा लॉन्चिंग के लिए कोई तारीख तय नहीं की गई है.

पतंजलि किंभो ऐप की ब्रांडिंग 'स्वदेशी चैट ऐप' के रूप में की गई थी. जो भारत में फेसबुक के स्वामित्व वाले वॉट्सऐप की जगह ले सके. इस ऐप को सबसे पहले 30 मई को लॉन्च किया गया था. हालांकि खराब सिक्योरिटी फीचर्स होने की वजह से इसे 24 घंटे के भीतर गूगल प्ले स्टोर से हटा दिया गया था.

इसके बाद इस ऐप के ट्रायल वर्जन को 27 अगस्त के आधिकारिक लॉन्च से पहले एंड-टू-एंड एनक्रिप्शन के साथ 15 अगस्त को दोबारा लॉन्च किया गया. लेकिन जब ढेरों यूजर्स ने आ रही दिक्कतों को रिपोर्ट किया फिर ऑफिशियल लॉन्च से पहले ही इसे सुरक्षा कारणों के चलते गूगल प्ले स्टोर से हटा लिया गया और लॉन्च टल गया.

Sunday, December 16, 2018

आख़िर नेपाल ने क्यों बैन किए भारतीय नोट

नेपाल की सरकार ने भारतीय मुद्रा के सौ से ऊपर के नोटों पर पाबंदी लगा दी है. मतलब नेपाल में सौ से ऊपर के भारतीय नोट नहीं चलेंगे. पाबंदी के पहले तक नेपाल में स्थानीय मुद्रा के साथ भारत के सभी नोट भी चलन में थे.

आख़िर नेपाल ने अचानक से ये फ़ैसला क्यों लिया? हाल ही में नेपाल के मंत्रियों की एक बैठक हुई थी और इसी बैठक में यह फ़ैसला लेकर एक नोटिस जारी किया गया कि 200, 500 और 2,000 के भारतीय नोट नेपाल में अवैध होंगे.

सबसे दिलचस्प ये है कि नेपाल ने इसकी कोई वजह नहीं बताई है. नेपाल की तरफ़ से जो आधिकारिक नोटिस जारी किया गया, उसमें भी कोई कारण नहीं बताया गया है. ऐसे में सवाल उठता है कि नेपाल को अचानक इसकी क्या ज़रूरत आन पड़ी?

काठमांडू स्थित वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमरे कहते हैं कि ये फ़ैसला क्यों लिया गया, अभी तक साफ़ नहीं है.

वो कहते हैं, ''ज़ाहिर है इसका असर लोगों पर पड़ेगा. ख़ासकर सीमाई इलाक़ों में भारतीय व्यापारियों को समस्या होगी. मुझे नहीं लगता है कि इससे भारत को कोई नुक़सान होगा. दोनों देशों के उन कामगारों को दिक़्क़त होगी जो एक दूसरे के देश में काम या व्यापार करते हैं.''

प्रभावी होगा फ़ैसला?
नेपाल सरकार का ये फ़ैसला कितना व्यावहारिक होगा? क्या इस फ़ैसले से लोग 100 से ऊपर के नोटों से लेनदेन बंद कर देंगे? इस सवाल के जवाब में घिमरे कहते हैं, ''ये सवाल वाक़ई अहम है कि क्या सरकार का फ़ैसला प्रभावी होगा? वो भी तब जब ये नोट न लेने वाले को दिक़्क़त है और न देने वाले को.''

हालांकि घिमरे कहते हैं कि भारतीय नोट पर पाबंदी लगाने की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है. वो कहते हैं, ''1999 में जब भारत के यात्री विमान को आतंकियों ने हाईजैक किया था तब भारत सरकार के आग्रह पर नेपाल ने 500 के नोट को बैन कर दिया था. भारत ने जब नोटबंदी की तो नेपाल में भी करोड़ों के 500 और 1000 के पुराने भारतीय नोट थे. अब तक इन पुराने नोटों का कोई समाधान नहीं निकल पाया है. ज़ाहिर है भारत के नोटबंदी के फ़ैसले से नेपाल को नुक़सान हुआ. लेकिन नेपाल ने अभी जो फ़ैसला लिया है उससे इस पर कोई असर नहीं पड़ेगा.''

पहले भी थी पाबंदी
नेपाल के बाज़ार में पारंपरिक रूप से भारतीय नोट स्वीकार्य हैं. भारत में भी नेपाली नागरिकों के लिए नौकरी और कारोबार करने की छूट है. भारत के फ़ेमा क़ानून यानी फ़ॉरन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट के अनुसार नेपाल जाने वाला व्यक्ति अपने साथ 25 हज़ार की नक़दी लेकर जा सकता है.

Monday, December 10, 2018

रेखा ने शाहरुख खान संग किया 'रश्के कमर...' पर डांस, देखें वीड‍ियो

बॉलीवुड की अदाकारा रेखा लंबे वक्त से पर्दे से दूर हैं लेकिन उनका चार्म आज भी बरकरार है. इस बात को एक बार फिर रेखा ने 'लक्स गोल्डन रोज अवॉर्ड्स' में साब‍ित कर द‍िया. इस अवॉर्ड शो को स्टार प्लस पर रव‍िवार रात टेलीकास्ट किया गया. शो को होस्ट शाहरुख खान ने किया.

'लक्स गोल्डन रोज अवॉर्ड्स' में रेखा को टाइमलेस ब्यूटी के अवॉर्ड से नवाजा गया. इस अवॉर्ड शो में रेखा अपने सदाबहार लुक ट्रेड‍िशनल कांजीवरम साड़ी में पहुंचीं. रेखा जब स्टेज पर आईं तो शाहरुख खान और करण जौहर ने उन्हें सम्मान द‍िया. अवॉर्ड स्पीच में रेखा ने कहा कि ये सम्मान मेरे ल‍िए खास है क्योंकि मेरी मां को भी लक्स गोल्डन रोज एक्ट्रेस में जब चुना गया तब मेरा जन्म हुआ था. आज 63 साल बाद मैं भी वहां पहुंच गई हूं. मेरे ल‍िए ये सम्मान बहुत खास है.

स्पीच देने के बाद बाद रेखा जैसे ही जाने लगीं तभी शाहरुख खान ने कहा, "रेखा जी आपकी अदाओं की दुन‍िया कायल है लेकिन मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं. आजकल एक नया गाना आया है रश्के कमर... आप इस पर डांस करती तो कैसा होता." किंग खान की र‍िक्वेस्ट को मानते हुए रेखा ने इस गाने पर शाहरुख के साथ डांस किया. रेखा का ये यादगार डांस वीड‍ियो सोशल मीड‍िया पर वायरल हो रहा है.

वहीं मध्य प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने मतगणना की वेबकास्टिंग न करने के निर्देश दिए हैं. साथ ही यह निर्देश जारी किए गए हैं कि काउंटिग हॉल में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और मतगणना के दौरान वाईफाई का इस्तेमाल न हो.

गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश के एक निजी होटल में ईवीएम मशीन और सागर जिले में बिना नंबर की स्कूल बस से स्ट्रॉन्ग रूम में ईवीएम पहुंचाए जाने का वीडियो जारी करते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि बीजेपी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जनादेश को पटलने की कोशिश कर रही है. वहीं, एक अन्य मामले में शुक्रवार को ही मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में लगभग एक घंटे के लिए बिजली नहीं होने की वजह से स्ट्रॉन्ग रूम का सीसीटीवी और एलईडी डिस्प्ले इस अवधि में काम नहीं कर पाया.

इन शिकायतों पर चुनाव आयोग ने भी माना है कि मध्य प्रदेश में ऐसी दो घटनाएं हुईं थीं जिसमें ईवीएम को लेकर नियमावली का पालन नहीं किया गया. लेकिन आयोग का कहना था कि यह गलती प्रक्रिया तक ही सीमित है और मशीनों से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई. लेकिन आयोग ने एक अधिकारी को मशीने देरी से जमा कराने के आरोप में सस्पेंड कर दिया.

Tuesday, December 4, 2018

11 दिसंबर के बाद सिद्धू को मिल सकती है बड़ी भूमिका

कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनके वफ़ादारों को नवजोत सिंह सिद्धू के उभार को भविष्य में होने वाले बदलाव के स्पष्ट संकेत के रूप में लेना चाहिए.

सिद्धू को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का विश्वास हासिल है और चुनावों के दौरान कांग्रेस के स्टार प्रचारक के रूप में राहुल और सोनिया गांधी के बाद सबसे ज़्यादा उन्हीं की मांग रहती है.

प्रचार के लिए सिद्धू की डिमांड कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्यों, ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के महासचिवों और कांग्रेस के शासन वाले राज्यों के मुख्यमंत्रियों से भी ज़्यादा है. इनमें अमरिंदर भी शामिल हैं, जिनका पंजाब से बाहर बहुत कम प्रभाव है.

दूसरे शब्दों में कहें तो पटियाला के इस दिलकश बल्लेबाज़ का समय अच्छा चल रहा है और उम्मीद है कि 2022 के आसपास या उससे पहले ही उन्हें पंजाब में बड़ी भूमिका मिल सकती है. पंजाब में 2022 में विधानसभा चुनाव होंगे.

भले ही कभी पार्टी अनुशासन, शालीनता और राजनीतिक मर्यादाओं की महीन लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन हो जाए लेकिन सिद्धू शब्दों से खेलना बख़ूबी जानते हैं.

इसलिए उनका अमरिंदर सिंह को अभिभावक, मार्गदर्शक और नेता बताना अपने शब्द वापस लेने या माफ़ी मांगने के बजाय आत्मीय संबंध जोड़ने वाला नज़र आया.

करतारपुर के हीरो साबित हुए सिद्धू
करतारपुर साहिब कॉरिडोर खुलने के घटनाक्रम से पहले अमरिंदर जहां उदासीन से नज़र आए वहीं सिद्धू काफ़ी सक्रिय रहे.

सिद्धू में राहुल और कांग्रेस को ऐसा नेता मिला है जो अकालियों और अमरिंदर दोनों से बढ़कर साबित हुआ है.

सिखों के बीच सिद्धू करतारपुर के असली हीरो हैं. हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान सिद्धू ने जोशीला अभियान चलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य विरोधियों पर निशाना साधा.

11 दिसंबर तय करेगा सिद्धू का भविष्य
सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने सिद्धू को कैप्टन अमरिंदर सिंह की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उस समय पार्टी में जगह दी थी, जब उनका बीजेपी और आम आदमी पार्टी के साथ मोलभाव सिरे नहीं चढ़ पाया था.

अगर आगामी 11 दिसंबर को पार्टी राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, मिज़ोरम और तेलंगाना में बेहतर प्रदर्शन करती है तो पंजाब की राजनीति में थोड़ी हलचल हो सकती है.

कांग्रेस में जब भी किसी क्षेत्रीय नेता की छवि बड़ी होने लगती है और वह स्वतंत्र रूप से काम करना शुरू करता है, पार्टी हाईकमान दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को उभारना शुरू कर देता है.

सोनिया और राहुल भले ही इंदिरा और राजीव की तरह मनमर्ज़ी से कम ही काम करते हैं लेकिन 11 दिसंबर के बाद अगर कांग्रेस दो-तीन राज्यों में जीत जाती है तो इससे राहुल गांधी का क़द और प्रभाव बढ़ेगा.

राहुल के उदय से चंडीगढ़ में भी उनके विश्वस्त लोग उभरेंगे, जहां पार्टी और सरकार 76 साल के ऐसे कैप्टन के नेतृत्व में काम कर रही है जिसकी छवि 'जी हुज़ूरी' न करने वाले मुख्यमंत्रियों की है.

Monday, November 19, 2018

वो दौर जब मर्दों को मोतियों से थी मोहब्बत

मोतियों की पूरी दुनिया शैदाई है. वो हज़ारों साल से पहने जा रहे हैं.

उस वक़्त भी मोतियों के हार पहने जाते थे, जब इंसान ने सोने या चांदी को नहीं खोजा था.

मानव सभ्यता के इतिहास के कमोबेश बराबर ही पुराना है, मोतियों का तारीख़ी सफ़र.

प्राचीन काल में मोती पहनने वाले समाज के ऊंचे तबक़े के लोग हुआ करते थे. सत्ता की ताक़त का प्रतीक भी मोती हुआ करता था.

प्राचीन काल की यूनान की देवी वीनस को ख़ूबसूरती, पवित्रता और उर्वरता का प्रतीक माना जाता था.

मोती इसलिए ख़ास हैं क्योंकि वो क़ुदरती तौर पर सीपियों से पैदा होते हैं, उन्हें किसी और तराश की ज़रूरत नहीं होती.

प्राचीन काल में खाड़ी देशों के मछुआरों के खोजे हुए मोती सबसे अच्छे माने जाते थे. दुनिया भर को मोतियों की सप्लाई यहीं से होती थी.

ईसा से एक हज़ार साल पहले भी हमें मोतियों का कारोबार होने के सबूत मिले हैं.

अरब व्यापारी चीन और भारत तक जाकर मोतियों को बेचा करते थे.

चीन के बादशाह और भारत के महाराजाओं के बीच मोती बहुत लोकप्रिय थे. कई सदियों तक औरतों और मर्दों, दोनों को बराबरी से मोतियों का शौक़ रहा.

अफ़सोस की बात है कि आज मर्दों का मोती पहनना ग़लत माना जाने लगा है.

सोलहवीं सदी की ब्रिटिश महारानी एलिज़ाबेथ, जिन्हें कुंवारी महारानी कहा जाता था, वो भी पवित्रता के प्रतीक के तौर पर मोतियों के हार पहना करती थीं.

18वीं सदी के यूरोप में मोती पहनने का फ़ैशन ख़ूब ज़ोरों पर था. रईस ख़ानदानों में मोतियों की विरासत पीढ़ी दर पीढ़ी चला करती थी.

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मोतियों की खेती
19वीं सदी में मोतियों के कारोबार में बड़ा मोड़ उस वक़्त आया जब किची मिकिमोतो ने मोतियों की खेती का तरीक़ा खोज निकाला.

किची मिकीमोतो चाहते थे कि हर महिला के गले में मोतियों का हार हो.

उनकी सोच ये थी कि मोती इतने सस्ते हों कि हर कोई पहन सके.

पहला गोल मोती जो कल्चर कर के तैयार किया गया, वो 1893 में बना था.

ये बिल्कुल वैसा ही था, जैसा किसी सीप के अंदर विकसित होता है. जापान में महिला गोताख़ोरों को समुद्र में भेजकर सीप जमा कराए जाते थे.

बीसवीं सदी के बीस के दशक में मोती पहनने का मतलब महिला का आज़ाद ख़याल होना माना जाता था.

1920 के दशक तक कल्चर्ड मोती पूरे पश्चिमी यूरोप में आसानी से हासिल किए जा सकने वाली चीज़ बन गए.

1930 के दशक में डिज़ाइनर कोको शनेल ने दिन के वक़्त मोती पहनने का चलन शुरू किया.

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हॉलीवुड फ़िल्मों में मोती
हॉलीवुड फ़िल्मों के बड़े-छोटे स्टार अक्सर मोतियों की माला पहने हुए दिख जाते थे. इससे भी मोतियों की लोकप्रियता आम लोगों में बढ़ गई.

फ़िल्म कलाकारों के अलावा लोकप्रिय राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की पत्नी जैकी कैनेडी ने भी मोतियों के हार पहनकर इनकी लोकप्रियता अमरीकी देशों में बढ़ाई.

Sunday, November 18, 2018

'मंगल मिशन' को बदल सकते हैं ये फफूंद वाले जूते

साल 2016 में डिज़ाइनर लिज़ सियोकाजलो को न्यूयॉर्क के म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट से एक ठेका मिला.

उन्हें 'मून बूट' को नए सिरे से बनाने को कहा गया. ये मून बूट अपोलो अंतरिक्ष मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों के बूटों से प्रेरित था.

मून बूट देखने में बर्फ़ में पहने जाने वाले बूटों जैसा था जिसमें मुलायम फ़र लगे हुए थे.

मून बूट को 1972 में उस वक़्त बनाया गया था, जब चांद पर मिशन की चर्चा ज़ोर-शोर से हुआ करती थी.

इसे कला की दुनिया में ये 20वीं सदी के प्लास्टिक युग का बड़ा प्रतीक माना जाता है.

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अब इस म्यूज़िम का रख-रखाव करने वाले इसे नई सदी का लुक देना चाहते थे.

लिज़ सियोकाजलो ने इस बूट की नए सिरे से परिकल्पना करनी शुरू की.

लिज़ को पता था कि अब प्लास्टिक के बाद का दौर है, तो किसी ऐसी चीज़ से बूट बनाने होंगे, जो जैविक पदार्थ हों.

लेकिन, अब इस बूट के लिए नई मंज़िल भी लिज़ को तय करनी थी.

अब मंगल ग्रह तक जाना है, तो बूट भी तो ख़ास होना चाहिए.

लिज़ कहती हैं कि, 'मंगल ग्रह को हमारे ख़्वाबों में ख़ास जगह हासिल है. ये ऐसा ठिकाना है जहां पर जाकर आप फिर से धरती पर कैसे रहें, इसकी कल्पना कर सकते हैं.'

लिज़ को इस ठेके के चलते एक ऐसी चीज़ मिली जिस पर इंजीनियरों और स्पेस साइंटिस्ट की पहले से ही निगाह थी.

नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी यानी ईएसए पहले से ही इस तत्व की मदद से अंतरिक्ष में नई चीज़ें बनाने पर काम कर रहे थे.

लिज़ के नए मून बूट का जो डिज़ाइन आख़िर में मंज़ूर हुआ, वो महिलाओं का मज़बूत दिखने वाला बूट था.

इसे किसी अंतरिक्षयान पर भी बनाया जा सकता था और इस बूट को बनाने के लिए ज़रूरत केवल दो चीज़ों की थी-इंसान का पसीना और कुछ कुकुरमुत्तों के बीजाणु.

अब अगर आप को मंगल ग्रह तक पहुंचना है, तो ये सफ़र फ़िलहाल तो सात महीनों तक का होगा. इस सफ़र पर आप बहुत ज़्यादा सामान भी नहीं ले जा सकेंगे.

लिज़ के हाथ जो जादुई चीज़ लगी है, उसका नाम है-माइसीलियम. ये फफूंद या कुकुरमुत्तों की शुरुआती अवस्था होती है. यानी जड़ें जिसके ज़रिए फफूंद फैलना शुरू करती है.

आपने इसे अक्सर खाने-पीने के सामान, कूड़े के ढेर पर पसरे हुए जाल के तौर पर देखा होगा. इसे ऐसे समझना आसान होगा कि कुकुरमुत्ते अगर फल हैं, तो माइसीलियम इसकी जड़.

माइसीलियम की ख़ूबियां ज़बरदस्त हैं. ये ख़राब चीज़ों को रिसाइकल करने की ताक़त रखता है.

ये लकड़ी के बुरादे या खेती के कचरे में फल-फूल सकता है. इससे ज़्यादा से ज़्यादा चीज़ें तैयार हो सकती हैं.

अगर सही माहौल मिले, तो ये अनंत मात्रा में फल-फूल सकता है. ये बिना टूटे हुए कंक्रीट से भी ज़्यादा दबाव झेल सकता है.

ये इंसुलेटर का काम करता है. यानी बिजली इससे नहीं गुज़र सकती. इसमें आग से मुक़ाबले की भी क्षमता होती है. अंतरिक्ष मिशन पर ये विकिरण यानी रेडिएशन से भी बचाने में मदद कर सकता है.

Friday, November 16, 2018

राफेल पर कांग्रेस का आरोप- PM ने नियम बदले, बैंक गारंटी हटाई, ये बड़ा घोटाला

कांग्रेस ने राफेल सौदे को लेकर गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फिर निशाना साधा और आरोप लगाया कि मोदी ने अफसरों, रक्षा मंत्री और रक्षा खरीद परिषद की राय के खिलाफ जाकर लड़ाकू विमानों के 'बेंचमार्क प्राइज' (आधार मूल्य) को बढ़ा दिया. पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने राफेल से जुड़ी बैंक गारंटी को माफ करवा दिया और मध्यस्थता के प्रावधान को बदल दिया जो देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है.

कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने राफेल मामले की संयुक्त संसदीय समिति की जांच की मांग दोहराते हुए यह सवाल किया कि आखिर प्रधानमंत्री ने किसे फायदा पहुंचाने का काम किया? कांग्रेस के ताजा आरोपों पर सरकार या बीजेपी की तरफ से फिलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

सुरजेवाला ने संवाददाताओं से कहा, 'देश के कानून मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों की लिखित राय के बावजूद चौकीदार ने चोर दरवाजे से सौदा बदल दिया. प्रधानमंत्री मोदी ने विमान के बेंचमार्क प्राइज़ को बढ़ाकर 62 हजार करोड़ रुपये से अधिक कर दिया, जबकि कांग्रेस के समय कीमत काफी कम थी.'

उन्होंने कहा, 'राफेल विमान की खरीद के लिए बातचीत करने वाली समिति में इसको लेकर खासा विवाद हो गया कि बेंचमार्क प्राइज़ क्या होगा. तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने बढ़ी हुई कीमत मानने से इनकार कर दिया.' सुरजेवाला ने दावा किया, 'रक्षा खरीद परिषद ने भी बढ़ी हुई कीमत स्वीकार नहीं की और कागज प्रधानमंत्री के पास भेज दिया। इन सबके बावजूद प्रधानमंत्री ने बढ़ी हुई कीमत को स्वीकार कर लिया.' उन्होंने कहा, ' हमारा सवाल है कि प्रधानमंत्री... आप किसको फायदा पहुंचा रहे थे?'

कांग्रेस नेता ने यह भी दावा किया, 'प्रधानमंत्री ने बैंक गारंटी को माफ कर दिया जो देश की सुरक्षा से खिलवाड़ है, जबकि कानून मंत्रालय ने राय दी थी कि बैंक गारंटी फ्रांस की सरकार से ली जाए."

राफेल का दाम कैसे बदला

सुरजेवाला ने कहा कि देश के चौकीदार ने चोर दरवाजे से राफेल का दाम कैसे बदला ये सब सामने आ चुका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राफेल का बेंचमार्क प्राइस 39,422 करोड़ से  बढ़ाकर 62,166 करोड़ रुपये कर दिया. कांग्रेस नेता ने कहा कि रक्षा मंत्री ने इस बढ़ी कीमत को मानने से इंकार कर दिया. रक्षा मंत्री समेत तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने इसे मानने से मना कर दिया. इन सब बातों के बावजूद प्रधानमंत्री ने बढ़े हुए प्राइस को मंजूरी दे दी.

सुरजेवाला ने कहा कि मोदी जी ने बैंक गारंटी की अनिवार्य शर्त देश हितों को ताक पर रखते हुए वेव ऑफ कर दी जबकि कानून मंत्रालय ने इसे जरूरी बताया था. इस संबंध में कानून मंत्रालय ने 9 दिसंबर 2015 को खत लिखा था. वहीं 18 अगस्त 2016 को एयर एक्विजिशन विंग ने भी बैंक गारंटी के बिना सौदे का विरोध किया था.

कांग्रेस नेता ने कहा कि इसके बाद यह मामला कानून मंत्रालय के पास गया. असल में कानून मंत्रालय ने 23 अगस्त 2016 को बैंक गारंटी की वकालत किया था. तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर 7 मार्च 2016 को कानून मंत्रालय की राय सहमत होकर फ़ाइल आगे बढ़ाई थी.

Tuesday, November 6, 2018

झारखंड की इन औरतों को क्यों चुभता है अफ़ग़ानिस्तान

अफ़ग़ानिस्तान में अज्ञात बंदूकधारियों ने इसी साल 6 मई को भारतीय मजदूरों का अपहरण किया गया था. इनमें से चार लोग झारखंड के हैं.

इनमें बगोदर प्रखंड के घाघरा गांव निवासी प्रकाश महतो, प्रसादी महतो, महूरी गांव के हुलास महतो और टाटीझरिया प्रखंड के बेडम गांव निवासी काली महतो शामिल हैं.

ये सभी अफ़ग़ानिस्तान में भारतीय उद्योगपति हर्ष गोयनका के स्वामित्व वाली कंपनी केइसी इंटरनेशनल के लिए काम करते थे.

विदेश मंत्री के हस्तक्षेप के बाद कंपनी ने अगवा किए गए मज़दूरों के परिजनों को वेतन देना शुरू कर दिया है. हालांकि परिजनों को मीडिया से बात नहीं करने की हिदायत दी गई है.

अपहरण के तुरंत बाद कंपनी ने इस प्रकरण पर आज तक अपना आधिकारिक पक्ष नहीं रखा है.

केइसी इंटरनेशनल आरपी गोयनका (आरपीजी) समूह की कंपनी है जिसे अफ़ग़ानिस्तान में बिजली की ट्रांसमिशन लाइन लगाने का ठेका मिला हुआ है. वहां काम करने के लिए झारखंड के कई लोग अफ़ग़ानिस्तान गए हैं. इनमें से अधिकतर लोग बगोदर के हैं.

भारत और अफ़ग़ानिस्तान की सरकारें अपहरण के छह महीने बाद भी इनका पता नहीं लगा सकी हैं. इस कारण इनके परिजन हताश हैं.

मुलिया देवी प्रसादी महतो की पत्नी हैं और वो महीनों से अपने पति के आने का इंतज़ार कर रही हैं. इनकी बेटी ने इसी साल दसवीं की परीक्षा पास की है. मुलिया देवी कहती हैं कि उनकी बेटी ने पढ़ाई छोड़ दी है.

मुलिया देवी कहती हैं, ''हमलोग ग़रीब हैं. मेरे पति इसलिए परदेस गए कि चार पैसा कमा कर बच्चों को ठीक से पढ़ाएंगे-लिखाएंगे. अब उनका पता ही नहीं चल रहा है. हमलोग कैसे ज़िंदा रहें. किस पर भरोसा करें. कौन वापस लाएगा मेरे पति को. अब तो पता ही नहीं चलता कि सरकार उन्हें छुड़ाने के लिए कुछ कर भी रही है या नहीं. मुझे मेरे पति से मिलवा दीजिए.''

आंदोलन करेंगे ग्रामीण
प्रसादी महतो के गांव के ही संतोष रजक इस मसले पर मोदी सरकार ने निराश हैं. उनका कहना है कि सरकार अफ़ग़ानिस्तान पर दबाव नहीं बना पा रही है.

महुरी गांव के हुलास महतो अफ़ग़ानिस्तान में अगवा भारतीय मज़दूरों में से एक हैं. यहां उनकी पत्नी प्रमिला देवी की हालत ख़राब होती जा रही है. वो पति के ग़म में ठीक से खा-पी भी नहीं रही हैं. उन्होंने बताया कि बच्चे जब पापा के बारे में पूछते हैं, तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता.

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपहरण के 40 दिन बाद अगवा किए गए मज़दूरों में से तीन की पत्नियों और प्रसादी महतो के बेटे से दिल्ली में मुलाक़ात की थी.

घाघरा गांव के प्रकाश महतो की पत्नी चमेली देवी उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल थीं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि विदेश मंत्री ने एक महीने के अंदर सभी का पता लगा लेने का आश्वासन दिया था.

झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी पिछले महीने इन मज़दूरों में से कुछ की पत्नियों से रांची में मुलाक़ात की थी. रघुवर दास ने इन्हें एक-एक लाख रुपए की मदद देने की घोषणा की थी, लेकिन यह पैसा अभी तक नहीं मिला है.

उनसे मिलने के बाद प्रमिला देवी ने बताया कि मुख्यमंत्री ने भी उनके अपहृत पति का पता जल्दी ही लगाने की बात कही थी, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ.

प्रवासी समूह के संचालक सिकंदर अली और बगोदर पश्चिम के मुखिया लक्ष्मण महतो ने बताया कि अफ़ग़ानिस्तान में अपहरण के बावजूद इस इलाक़े से मज़दूरों का पलायन नहीं रुका है. यहां बेरोज़गारी बड़ी समस्या है और लोग अभी भी अफ़ग़ानिस्तान जा रहे हैं.

Monday, November 5, 2018

सबसे ख़ुशहाल देश भूटान में क्यों बढ़ रहा अवसाद और ख़ुदकुशी

भूटान की पहचान पूरी दुनिया में ख़ुशहाल मुल्क के रूप में है. कहा जाता है कि भूटान की प्रगति का दर्शन जीडीपी (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्शन) नहीं जीएनच (ग्रॉस नेशनल हैपिनेस) है.

विदेशी पत्रकार भी इस बात को मानते हैं कि भूटान पूरी दुनिया में अनुपम है और पर्यावरण की कसौटी पर दुनिया के देश इसकी तुलना में पीछे छूट जाते हैं.

लेकिन इसका मतलब यह क़तई नहीं है कि भूटानी नागरिक व्यग्रता, अवसाद और मानसिक विकार से मुक्त हैं.

भूटान की राजधानी थिम्पू स्थित नेशनल रेफ़रल हॉस्पिटल के रिकॉर्ड से पता चलता है कि यहां व्यग्रता और अवसाद सबसे सामान्य मानसिक बीमारियां हैं. भूटान की वार्षिक हेल्थ बुलेटिन के अनुसार 2017 में मानसिक बीमारी से जुड़े 4,200 मामले सामने आए.

आत्महत्या के मामले में यह देश अब कोई अजनबी नहीं रहा. यहां हर साल आत्महत्या करने वालों की संख्या बढ़ रही है.

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भूटान की मुश्किल से 10 लाख की आबादी है. अगर यहां सैकड़ों लोग भी ख़ुदकुशी करते हैं तो जनसंख्या के अनुपात में ये आंकड़ा बहुत ज़्यादा है. भूटान में आत्महत्या के जो मामले दर्ज होते हैं उससे पता चलता है कि इसकी वजह अवसाद और मानसिक बीमारी रही है.

द डिप्लोमैट की एक रिपोर्ट के अनुसार इस देश में केवल चार मनोचिकित्सक हैं और कोई मनोवैज्ञानिक नहीं है. इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रशिक्षित काउंसलर भी हैं तो राजधानी तक ही सीमित हैं. इसके साथ ही सारे मनोचिकित्सक भी थिम्पू में ही हैं.

हाल के दिनों में भूटान की सरकार ने मानसिक सेहत पर बजट में भी बढ़ोतरी की है.

भूटान के स्वास्थ मंत्रालय ने अगले पांच साल के लिए मानसिक स्वास्थ्य पर 6 करोड़ के बजट का प्रस्ताव रखा है. कहा जा रहा है कि भूटान में मानसिक स्वास्थ्य सेवा के साथ शिक्षा और जागरुकता को लेकर बहुत काम करने की ज़रूरत है.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भूटान की एक समस्या और है- भाषा. भूटान की राष्ट्र भाषा ज़ोंका है, लेकिन इसके साथ ही कई बोलियां भी हैं. कहा जा रहा है कि बोलियों और भाषा में मानसिक बीमारी या उसकी स्थिति को समझाने की क्षमता नहीं है.

 से देश के दो मनोचिकित्सकों ने कहा है कि उनकी भाषा में मानसिक स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त शब्दावली नहीं हैं. मनोचिकित्सा पर भूटान में काम केवल दो दशक पहले शुरू हुआ.

मानसिक बीमारी में ज़्यादातर भूटानी नागरिक पागलपन के शिकार हैं. ज़ाहिर है पागलपन को लोग किसी कंलक की तरह देखते हैं. भूटान में शायद ही कभी मानसिक बीमारी पर बहस या कोई कैंपेन चलाया गया हो. हालांकि ग्रॉस नेशनल हैपीनेस में मानसिक सेहत को नौंवे नंबर पर रखा गया है.

भूटान में मानसिक स्वास्थ्य की चिंता स्वास्थ्य मंत्रालय की 2014 में ख़ुदकुशी पर आई रिपोर्ट के बाद से और बढ़ गई है. पिछली सरकार में स्वास्थ्य मंत्रालय ने आत्महत्या को रोकने के लिए एक तीन वर्षीय योजना बनाई थी.

इसका नाम था- नेशनल सुसाइड प्रिवेंशन प्रोग्राम (एनएसपीपी). भूटान में ख़ुदकुशी को रोकने के लिए कोई हेल्पलाइन नंबर नहीं है.

भूटान अपनी कई ख़ासियतों के लिए जाना जाता है. यह बौद्ध देश है जहां के संविधान में प्रगति के मायने ख़ुशहाली से जोड़ा गया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जिन देशों के लोग सबसे ज़्यादा आत्महत्या करते हैं, उनमें भूटान 21वें नंबर पर था.