Sunday, November 18, 2018

'मंगल मिशन' को बदल सकते हैं ये फफूंद वाले जूते

साल 2016 में डिज़ाइनर लिज़ सियोकाजलो को न्यूयॉर्क के म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट से एक ठेका मिला.

उन्हें 'मून बूट' को नए सिरे से बनाने को कहा गया. ये मून बूट अपोलो अंतरिक्ष मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों के बूटों से प्रेरित था.

मून बूट देखने में बर्फ़ में पहने जाने वाले बूटों जैसा था जिसमें मुलायम फ़र लगे हुए थे.

मून बूट को 1972 में उस वक़्त बनाया गया था, जब चांद पर मिशन की चर्चा ज़ोर-शोर से हुआ करती थी.

इसे कला की दुनिया में ये 20वीं सदी के प्लास्टिक युग का बड़ा प्रतीक माना जाता है.

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अब इस म्यूज़िम का रख-रखाव करने वाले इसे नई सदी का लुक देना चाहते थे.

लिज़ सियोकाजलो ने इस बूट की नए सिरे से परिकल्पना करनी शुरू की.

लिज़ को पता था कि अब प्लास्टिक के बाद का दौर है, तो किसी ऐसी चीज़ से बूट बनाने होंगे, जो जैविक पदार्थ हों.

लेकिन, अब इस बूट के लिए नई मंज़िल भी लिज़ को तय करनी थी.

अब मंगल ग्रह तक जाना है, तो बूट भी तो ख़ास होना चाहिए.

लिज़ कहती हैं कि, 'मंगल ग्रह को हमारे ख़्वाबों में ख़ास जगह हासिल है. ये ऐसा ठिकाना है जहां पर जाकर आप फिर से धरती पर कैसे रहें, इसकी कल्पना कर सकते हैं.'

लिज़ को इस ठेके के चलते एक ऐसी चीज़ मिली जिस पर इंजीनियरों और स्पेस साइंटिस्ट की पहले से ही निगाह थी.

नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी यानी ईएसए पहले से ही इस तत्व की मदद से अंतरिक्ष में नई चीज़ें बनाने पर काम कर रहे थे.

लिज़ के नए मून बूट का जो डिज़ाइन आख़िर में मंज़ूर हुआ, वो महिलाओं का मज़बूत दिखने वाला बूट था.

इसे किसी अंतरिक्षयान पर भी बनाया जा सकता था और इस बूट को बनाने के लिए ज़रूरत केवल दो चीज़ों की थी-इंसान का पसीना और कुछ कुकुरमुत्तों के बीजाणु.

अब अगर आप को मंगल ग्रह तक पहुंचना है, तो ये सफ़र फ़िलहाल तो सात महीनों तक का होगा. इस सफ़र पर आप बहुत ज़्यादा सामान भी नहीं ले जा सकेंगे.

लिज़ के हाथ जो जादुई चीज़ लगी है, उसका नाम है-माइसीलियम. ये फफूंद या कुकुरमुत्तों की शुरुआती अवस्था होती है. यानी जड़ें जिसके ज़रिए फफूंद फैलना शुरू करती है.

आपने इसे अक्सर खाने-पीने के सामान, कूड़े के ढेर पर पसरे हुए जाल के तौर पर देखा होगा. इसे ऐसे समझना आसान होगा कि कुकुरमुत्ते अगर फल हैं, तो माइसीलियम इसकी जड़.

माइसीलियम की ख़ूबियां ज़बरदस्त हैं. ये ख़राब चीज़ों को रिसाइकल करने की ताक़त रखता है.

ये लकड़ी के बुरादे या खेती के कचरे में फल-फूल सकता है. इससे ज़्यादा से ज़्यादा चीज़ें तैयार हो सकती हैं.

अगर सही माहौल मिले, तो ये अनंत मात्रा में फल-फूल सकता है. ये बिना टूटे हुए कंक्रीट से भी ज़्यादा दबाव झेल सकता है.

ये इंसुलेटर का काम करता है. यानी बिजली इससे नहीं गुज़र सकती. इसमें आग से मुक़ाबले की भी क्षमता होती है. अंतरिक्ष मिशन पर ये विकिरण यानी रेडिएशन से भी बचाने में मदद कर सकता है.

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