मोतियों की पूरी दुनिया शैदाई है. वो हज़ारों साल से पहने जा रहे हैं.
उस वक़्त भी मोतियों के हार पहने जाते थे, जब इंसान ने सोने या चांदी को नहीं खोजा था.
मानव सभ्यता के इतिहास के कमोबेश बराबर ही पुराना है, मोतियों का तारीख़ी सफ़र.
प्राचीन काल में मोती पहनने वाले समाज के ऊंचे तबक़े के लोग हुआ करते थे. सत्ता की ताक़त का प्रतीक भी मोती हुआ करता था.
प्राचीन काल की यूनान की देवी वीनस को ख़ूबसूरती, पवित्रता और उर्वरता का प्रतीक माना जाता था.
मोती इसलिए ख़ास हैं क्योंकि वो क़ुदरती तौर पर सीपियों से पैदा होते हैं, उन्हें किसी और तराश की ज़रूरत नहीं होती.
प्राचीन काल में खाड़ी देशों के मछुआरों के खोजे हुए मोती सबसे अच्छे माने जाते थे. दुनिया भर को मोतियों की सप्लाई यहीं से होती थी.
ईसा से एक हज़ार साल पहले भी हमें मोतियों का कारोबार होने के सबूत मिले हैं.
अरब व्यापारी चीन और भारत तक जाकर मोतियों को बेचा करते थे.
चीन के बादशाह और भारत के महाराजाओं के बीच मोती बहुत लोकप्रिय थे. कई सदियों तक औरतों और मर्दों, दोनों को बराबरी से मोतियों का शौक़ रहा.
अफ़सोस की बात है कि आज मर्दों का मोती पहनना ग़लत माना जाने लगा है.
सोलहवीं सदी की ब्रिटिश महारानी एलिज़ाबेथ, जिन्हें कुंवारी महारानी कहा जाता था, वो भी पवित्रता के प्रतीक के तौर पर मोतियों के हार पहना करती थीं.
18वीं सदी के यूरोप में मोती पहनने का फ़ैशन ख़ूब ज़ोरों पर था. रईस ख़ानदानों में मोतियों की विरासत पीढ़ी दर पीढ़ी चला करती थी.
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मोतियों की खेती
19वीं सदी में मोतियों के कारोबार में बड़ा मोड़ उस वक़्त आया जब किची मिकिमोतो ने मोतियों की खेती का तरीक़ा खोज निकाला.
किची मिकीमोतो चाहते थे कि हर महिला के गले में मोतियों का हार हो.
उनकी सोच ये थी कि मोती इतने सस्ते हों कि हर कोई पहन सके.
पहला गोल मोती जो कल्चर कर के तैयार किया गया, वो 1893 में बना था.
ये बिल्कुल वैसा ही था, जैसा किसी सीप के अंदर विकसित होता है. जापान में महिला गोताख़ोरों को समुद्र में भेजकर सीप जमा कराए जाते थे.
बीसवीं सदी के बीस के दशक में मोती पहनने का मतलब महिला का आज़ाद ख़याल होना माना जाता था.
1920 के दशक तक कल्चर्ड मोती पूरे पश्चिमी यूरोप में आसानी से हासिल किए जा सकने वाली चीज़ बन गए.
1930 के दशक में डिज़ाइनर कोको शनेल ने दिन के वक़्त मोती पहनने का चलन शुरू किया.
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हॉलीवुड फ़िल्मों में मोती
हॉलीवुड फ़िल्मों के बड़े-छोटे स्टार अक्सर मोतियों की माला पहने हुए दिख जाते थे. इससे भी मोतियों की लोकप्रियता आम लोगों में बढ़ गई.
फ़िल्म कलाकारों के अलावा लोकप्रिय राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की पत्नी जैकी कैनेडी ने भी मोतियों के हार पहनकर इनकी लोकप्रियता अमरीकी देशों में बढ़ाई.
Monday, November 19, 2018
Sunday, November 18, 2018
'मंगल मिशन' को बदल सकते हैं ये फफूंद वाले जूते
साल 2016 में डिज़ाइनर लिज़ सियोकाजलो को न्यूयॉर्क के म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट से एक ठेका मिला.
उन्हें 'मून बूट' को नए सिरे से बनाने को कहा गया. ये मून बूट अपोलो अंतरिक्ष मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों के बूटों से प्रेरित था.
मून बूट देखने में बर्फ़ में पहने जाने वाले बूटों जैसा था जिसमें मुलायम फ़र लगे हुए थे.
मून बूट को 1972 में उस वक़्त बनाया गया था, जब चांद पर मिशन की चर्चा ज़ोर-शोर से हुआ करती थी.
इसे कला की दुनिया में ये 20वीं सदी के प्लास्टिक युग का बड़ा प्रतीक माना जाता है.
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अब इस म्यूज़िम का रख-रखाव करने वाले इसे नई सदी का लुक देना चाहते थे.
लिज़ सियोकाजलो ने इस बूट की नए सिरे से परिकल्पना करनी शुरू की.
लिज़ को पता था कि अब प्लास्टिक के बाद का दौर है, तो किसी ऐसी चीज़ से बूट बनाने होंगे, जो जैविक पदार्थ हों.
लेकिन, अब इस बूट के लिए नई मंज़िल भी लिज़ को तय करनी थी.
अब मंगल ग्रह तक जाना है, तो बूट भी तो ख़ास होना चाहिए.
लिज़ कहती हैं कि, 'मंगल ग्रह को हमारे ख़्वाबों में ख़ास जगह हासिल है. ये ऐसा ठिकाना है जहां पर जाकर आप फिर से धरती पर कैसे रहें, इसकी कल्पना कर सकते हैं.'
लिज़ को इस ठेके के चलते एक ऐसी चीज़ मिली जिस पर इंजीनियरों और स्पेस साइंटिस्ट की पहले से ही निगाह थी.
नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी यानी ईएसए पहले से ही इस तत्व की मदद से अंतरिक्ष में नई चीज़ें बनाने पर काम कर रहे थे.
लिज़ के नए मून बूट का जो डिज़ाइन आख़िर में मंज़ूर हुआ, वो महिलाओं का मज़बूत दिखने वाला बूट था.
इसे किसी अंतरिक्षयान पर भी बनाया जा सकता था और इस बूट को बनाने के लिए ज़रूरत केवल दो चीज़ों की थी-इंसान का पसीना और कुछ कुकुरमुत्तों के बीजाणु.
अब अगर आप को मंगल ग्रह तक पहुंचना है, तो ये सफ़र फ़िलहाल तो सात महीनों तक का होगा. इस सफ़र पर आप बहुत ज़्यादा सामान भी नहीं ले जा सकेंगे.
लिज़ के हाथ जो जादुई चीज़ लगी है, उसका नाम है-माइसीलियम. ये फफूंद या कुकुरमुत्तों की शुरुआती अवस्था होती है. यानी जड़ें जिसके ज़रिए फफूंद फैलना शुरू करती है.
आपने इसे अक्सर खाने-पीने के सामान, कूड़े के ढेर पर पसरे हुए जाल के तौर पर देखा होगा. इसे ऐसे समझना आसान होगा कि कुकुरमुत्ते अगर फल हैं, तो माइसीलियम इसकी जड़.
माइसीलियम की ख़ूबियां ज़बरदस्त हैं. ये ख़राब चीज़ों को रिसाइकल करने की ताक़त रखता है.
ये लकड़ी के बुरादे या खेती के कचरे में फल-फूल सकता है. इससे ज़्यादा से ज़्यादा चीज़ें तैयार हो सकती हैं.
अगर सही माहौल मिले, तो ये अनंत मात्रा में फल-फूल सकता है. ये बिना टूटे हुए कंक्रीट से भी ज़्यादा दबाव झेल सकता है.
ये इंसुलेटर का काम करता है. यानी बिजली इससे नहीं गुज़र सकती. इसमें आग से मुक़ाबले की भी क्षमता होती है. अंतरिक्ष मिशन पर ये विकिरण यानी रेडिएशन से भी बचाने में मदद कर सकता है.
उन्हें 'मून बूट' को नए सिरे से बनाने को कहा गया. ये मून बूट अपोलो अंतरिक्ष मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों के बूटों से प्रेरित था.
मून बूट देखने में बर्फ़ में पहने जाने वाले बूटों जैसा था जिसमें मुलायम फ़र लगे हुए थे.
मून बूट को 1972 में उस वक़्त बनाया गया था, जब चांद पर मिशन की चर्चा ज़ोर-शोर से हुआ करती थी.
इसे कला की दुनिया में ये 20वीं सदी के प्लास्टिक युग का बड़ा प्रतीक माना जाता है.
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अब इस म्यूज़िम का रख-रखाव करने वाले इसे नई सदी का लुक देना चाहते थे.
लिज़ सियोकाजलो ने इस बूट की नए सिरे से परिकल्पना करनी शुरू की.
लिज़ को पता था कि अब प्लास्टिक के बाद का दौर है, तो किसी ऐसी चीज़ से बूट बनाने होंगे, जो जैविक पदार्थ हों.
लेकिन, अब इस बूट के लिए नई मंज़िल भी लिज़ को तय करनी थी.
अब मंगल ग्रह तक जाना है, तो बूट भी तो ख़ास होना चाहिए.
लिज़ कहती हैं कि, 'मंगल ग्रह को हमारे ख़्वाबों में ख़ास जगह हासिल है. ये ऐसा ठिकाना है जहां पर जाकर आप फिर से धरती पर कैसे रहें, इसकी कल्पना कर सकते हैं.'
लिज़ को इस ठेके के चलते एक ऐसी चीज़ मिली जिस पर इंजीनियरों और स्पेस साइंटिस्ट की पहले से ही निगाह थी.
नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी यानी ईएसए पहले से ही इस तत्व की मदद से अंतरिक्ष में नई चीज़ें बनाने पर काम कर रहे थे.
लिज़ के नए मून बूट का जो डिज़ाइन आख़िर में मंज़ूर हुआ, वो महिलाओं का मज़बूत दिखने वाला बूट था.
इसे किसी अंतरिक्षयान पर भी बनाया जा सकता था और इस बूट को बनाने के लिए ज़रूरत केवल दो चीज़ों की थी-इंसान का पसीना और कुछ कुकुरमुत्तों के बीजाणु.
अब अगर आप को मंगल ग्रह तक पहुंचना है, तो ये सफ़र फ़िलहाल तो सात महीनों तक का होगा. इस सफ़र पर आप बहुत ज़्यादा सामान भी नहीं ले जा सकेंगे.
लिज़ के हाथ जो जादुई चीज़ लगी है, उसका नाम है-माइसीलियम. ये फफूंद या कुकुरमुत्तों की शुरुआती अवस्था होती है. यानी जड़ें जिसके ज़रिए फफूंद फैलना शुरू करती है.
आपने इसे अक्सर खाने-पीने के सामान, कूड़े के ढेर पर पसरे हुए जाल के तौर पर देखा होगा. इसे ऐसे समझना आसान होगा कि कुकुरमुत्ते अगर फल हैं, तो माइसीलियम इसकी जड़.
माइसीलियम की ख़ूबियां ज़बरदस्त हैं. ये ख़राब चीज़ों को रिसाइकल करने की ताक़त रखता है.
ये लकड़ी के बुरादे या खेती के कचरे में फल-फूल सकता है. इससे ज़्यादा से ज़्यादा चीज़ें तैयार हो सकती हैं.
अगर सही माहौल मिले, तो ये अनंत मात्रा में फल-फूल सकता है. ये बिना टूटे हुए कंक्रीट से भी ज़्यादा दबाव झेल सकता है.
ये इंसुलेटर का काम करता है. यानी बिजली इससे नहीं गुज़र सकती. इसमें आग से मुक़ाबले की भी क्षमता होती है. अंतरिक्ष मिशन पर ये विकिरण यानी रेडिएशन से भी बचाने में मदद कर सकता है.
Friday, November 16, 2018
राफेल पर कांग्रेस का आरोप- PM ने नियम बदले, बैंक गारंटी हटाई, ये बड़ा घोटाला
कांग्रेस ने राफेल सौदे को लेकर गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फिर निशाना साधा और आरोप लगाया कि मोदी ने अफसरों, रक्षा मंत्री और रक्षा खरीद परिषद की राय के खिलाफ जाकर लड़ाकू विमानों के 'बेंचमार्क प्राइज' (आधार मूल्य) को बढ़ा दिया. पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने राफेल से जुड़ी बैंक गारंटी को माफ करवा दिया और मध्यस्थता के प्रावधान को बदल दिया जो देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है.
कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने राफेल मामले की संयुक्त संसदीय समिति की जांच की मांग दोहराते हुए यह सवाल किया कि आखिर प्रधानमंत्री ने किसे फायदा पहुंचाने का काम किया? कांग्रेस के ताजा आरोपों पर सरकार या बीजेपी की तरफ से फिलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.
सुरजेवाला ने संवाददाताओं से कहा, 'देश के कानून मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों की लिखित राय के बावजूद चौकीदार ने चोर दरवाजे से सौदा बदल दिया. प्रधानमंत्री मोदी ने विमान के बेंचमार्क प्राइज़ को बढ़ाकर 62 हजार करोड़ रुपये से अधिक कर दिया, जबकि कांग्रेस के समय कीमत काफी कम थी.'
उन्होंने कहा, 'राफेल विमान की खरीद के लिए बातचीत करने वाली समिति में इसको लेकर खासा विवाद हो गया कि बेंचमार्क प्राइज़ क्या होगा. तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने बढ़ी हुई कीमत मानने से इनकार कर दिया.' सुरजेवाला ने दावा किया, 'रक्षा खरीद परिषद ने भी बढ़ी हुई कीमत स्वीकार नहीं की और कागज प्रधानमंत्री के पास भेज दिया। इन सबके बावजूद प्रधानमंत्री ने बढ़ी हुई कीमत को स्वीकार कर लिया.' उन्होंने कहा, ' हमारा सवाल है कि प्रधानमंत्री... आप किसको फायदा पहुंचा रहे थे?'
कांग्रेस नेता ने यह भी दावा किया, 'प्रधानमंत्री ने बैंक गारंटी को माफ कर दिया जो देश की सुरक्षा से खिलवाड़ है, जबकि कानून मंत्रालय ने राय दी थी कि बैंक गारंटी फ्रांस की सरकार से ली जाए."
राफेल का दाम कैसे बदला
सुरजेवाला ने कहा कि देश के चौकीदार ने चोर दरवाजे से राफेल का दाम कैसे बदला ये सब सामने आ चुका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राफेल का बेंचमार्क प्राइस 39,422 करोड़ से बढ़ाकर 62,166 करोड़ रुपये कर दिया. कांग्रेस नेता ने कहा कि रक्षा मंत्री ने इस बढ़ी कीमत को मानने से इंकार कर दिया. रक्षा मंत्री समेत तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने इसे मानने से मना कर दिया. इन सब बातों के बावजूद प्रधानमंत्री ने बढ़े हुए प्राइस को मंजूरी दे दी.
सुरजेवाला ने कहा कि मोदी जी ने बैंक गारंटी की अनिवार्य शर्त देश हितों को ताक पर रखते हुए वेव ऑफ कर दी जबकि कानून मंत्रालय ने इसे जरूरी बताया था. इस संबंध में कानून मंत्रालय ने 9 दिसंबर 2015 को खत लिखा था. वहीं 18 अगस्त 2016 को एयर एक्विजिशन विंग ने भी बैंक गारंटी के बिना सौदे का विरोध किया था.
कांग्रेस नेता ने कहा कि इसके बाद यह मामला कानून मंत्रालय के पास गया. असल में कानून मंत्रालय ने 23 अगस्त 2016 को बैंक गारंटी की वकालत किया था. तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर 7 मार्च 2016 को कानून मंत्रालय की राय सहमत होकर फ़ाइल आगे बढ़ाई थी.
कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने राफेल मामले की संयुक्त संसदीय समिति की जांच की मांग दोहराते हुए यह सवाल किया कि आखिर प्रधानमंत्री ने किसे फायदा पहुंचाने का काम किया? कांग्रेस के ताजा आरोपों पर सरकार या बीजेपी की तरफ से फिलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.
सुरजेवाला ने संवाददाताओं से कहा, 'देश के कानून मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों की लिखित राय के बावजूद चौकीदार ने चोर दरवाजे से सौदा बदल दिया. प्रधानमंत्री मोदी ने विमान के बेंचमार्क प्राइज़ को बढ़ाकर 62 हजार करोड़ रुपये से अधिक कर दिया, जबकि कांग्रेस के समय कीमत काफी कम थी.'
उन्होंने कहा, 'राफेल विमान की खरीद के लिए बातचीत करने वाली समिति में इसको लेकर खासा विवाद हो गया कि बेंचमार्क प्राइज़ क्या होगा. तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने बढ़ी हुई कीमत मानने से इनकार कर दिया.' सुरजेवाला ने दावा किया, 'रक्षा खरीद परिषद ने भी बढ़ी हुई कीमत स्वीकार नहीं की और कागज प्रधानमंत्री के पास भेज दिया। इन सबके बावजूद प्रधानमंत्री ने बढ़ी हुई कीमत को स्वीकार कर लिया.' उन्होंने कहा, ' हमारा सवाल है कि प्रधानमंत्री... आप किसको फायदा पहुंचा रहे थे?'
कांग्रेस नेता ने यह भी दावा किया, 'प्रधानमंत्री ने बैंक गारंटी को माफ कर दिया जो देश की सुरक्षा से खिलवाड़ है, जबकि कानून मंत्रालय ने राय दी थी कि बैंक गारंटी फ्रांस की सरकार से ली जाए."
राफेल का दाम कैसे बदला
सुरजेवाला ने कहा कि देश के चौकीदार ने चोर दरवाजे से राफेल का दाम कैसे बदला ये सब सामने आ चुका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राफेल का बेंचमार्क प्राइस 39,422 करोड़ से बढ़ाकर 62,166 करोड़ रुपये कर दिया. कांग्रेस नेता ने कहा कि रक्षा मंत्री ने इस बढ़ी कीमत को मानने से इंकार कर दिया. रक्षा मंत्री समेत तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने इसे मानने से मना कर दिया. इन सब बातों के बावजूद प्रधानमंत्री ने बढ़े हुए प्राइस को मंजूरी दे दी.
सुरजेवाला ने कहा कि मोदी जी ने बैंक गारंटी की अनिवार्य शर्त देश हितों को ताक पर रखते हुए वेव ऑफ कर दी जबकि कानून मंत्रालय ने इसे जरूरी बताया था. इस संबंध में कानून मंत्रालय ने 9 दिसंबर 2015 को खत लिखा था. वहीं 18 अगस्त 2016 को एयर एक्विजिशन विंग ने भी बैंक गारंटी के बिना सौदे का विरोध किया था.
कांग्रेस नेता ने कहा कि इसके बाद यह मामला कानून मंत्रालय के पास गया. असल में कानून मंत्रालय ने 23 अगस्त 2016 को बैंक गारंटी की वकालत किया था. तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर 7 मार्च 2016 को कानून मंत्रालय की राय सहमत होकर फ़ाइल आगे बढ़ाई थी.
Tuesday, November 6, 2018
झारखंड की इन औरतों को क्यों चुभता है अफ़ग़ानिस्तान
अफ़ग़ानिस्तान में अज्ञात बंदूकधारियों ने इसी साल 6 मई को भारतीय मजदूरों का अपहरण किया गया था. इनमें से चार लोग झारखंड के हैं.
इनमें बगोदर प्रखंड के घाघरा गांव निवासी प्रकाश महतो, प्रसादी महतो, महूरी गांव के हुलास महतो और टाटीझरिया प्रखंड के बेडम गांव निवासी काली महतो शामिल हैं.
ये सभी अफ़ग़ानिस्तान में भारतीय उद्योगपति हर्ष गोयनका के स्वामित्व वाली कंपनी केइसी इंटरनेशनल के लिए काम करते थे.
विदेश मंत्री के हस्तक्षेप के बाद कंपनी ने अगवा किए गए मज़दूरों के परिजनों को वेतन देना शुरू कर दिया है. हालांकि परिजनों को मीडिया से बात नहीं करने की हिदायत दी गई है.
अपहरण के तुरंत बाद कंपनी ने इस प्रकरण पर आज तक अपना आधिकारिक पक्ष नहीं रखा है.
केइसी इंटरनेशनल आरपी गोयनका (आरपीजी) समूह की कंपनी है जिसे अफ़ग़ानिस्तान में बिजली की ट्रांसमिशन लाइन लगाने का ठेका मिला हुआ है. वहां काम करने के लिए झारखंड के कई लोग अफ़ग़ानिस्तान गए हैं. इनमें से अधिकतर लोग बगोदर के हैं.
भारत और अफ़ग़ानिस्तान की सरकारें अपहरण के छह महीने बाद भी इनका पता नहीं लगा सकी हैं. इस कारण इनके परिजन हताश हैं.
मुलिया देवी प्रसादी महतो की पत्नी हैं और वो महीनों से अपने पति के आने का इंतज़ार कर रही हैं. इनकी बेटी ने इसी साल दसवीं की परीक्षा पास की है. मुलिया देवी कहती हैं कि उनकी बेटी ने पढ़ाई छोड़ दी है.
मुलिया देवी कहती हैं, ''हमलोग ग़रीब हैं. मेरे पति इसलिए परदेस गए कि चार पैसा कमा कर बच्चों को ठीक से पढ़ाएंगे-लिखाएंगे. अब उनका पता ही नहीं चल रहा है. हमलोग कैसे ज़िंदा रहें. किस पर भरोसा करें. कौन वापस लाएगा मेरे पति को. अब तो पता ही नहीं चलता कि सरकार उन्हें छुड़ाने के लिए कुछ कर भी रही है या नहीं. मुझे मेरे पति से मिलवा दीजिए.''
आंदोलन करेंगे ग्रामीण
प्रसादी महतो के गांव के ही संतोष रजक इस मसले पर मोदी सरकार ने निराश हैं. उनका कहना है कि सरकार अफ़ग़ानिस्तान पर दबाव नहीं बना पा रही है.
महुरी गांव के हुलास महतो अफ़ग़ानिस्तान में अगवा भारतीय मज़दूरों में से एक हैं. यहां उनकी पत्नी प्रमिला देवी की हालत ख़राब होती जा रही है. वो पति के ग़म में ठीक से खा-पी भी नहीं रही हैं. उन्होंने बताया कि बच्चे जब पापा के बारे में पूछते हैं, तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता.
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपहरण के 40 दिन बाद अगवा किए गए मज़दूरों में से तीन की पत्नियों और प्रसादी महतो के बेटे से दिल्ली में मुलाक़ात की थी.
घाघरा गांव के प्रकाश महतो की पत्नी चमेली देवी उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल थीं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि विदेश मंत्री ने एक महीने के अंदर सभी का पता लगा लेने का आश्वासन दिया था.
झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी पिछले महीने इन मज़दूरों में से कुछ की पत्नियों से रांची में मुलाक़ात की थी. रघुवर दास ने इन्हें एक-एक लाख रुपए की मदद देने की घोषणा की थी, लेकिन यह पैसा अभी तक नहीं मिला है.
उनसे मिलने के बाद प्रमिला देवी ने बताया कि मुख्यमंत्री ने भी उनके अपहृत पति का पता जल्दी ही लगाने की बात कही थी, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ.
प्रवासी समूह के संचालक सिकंदर अली और बगोदर पश्चिम के मुखिया लक्ष्मण महतो ने बताया कि अफ़ग़ानिस्तान में अपहरण के बावजूद इस इलाक़े से मज़दूरों का पलायन नहीं रुका है. यहां बेरोज़गारी बड़ी समस्या है और लोग अभी भी अफ़ग़ानिस्तान जा रहे हैं.
इनमें बगोदर प्रखंड के घाघरा गांव निवासी प्रकाश महतो, प्रसादी महतो, महूरी गांव के हुलास महतो और टाटीझरिया प्रखंड के बेडम गांव निवासी काली महतो शामिल हैं.
ये सभी अफ़ग़ानिस्तान में भारतीय उद्योगपति हर्ष गोयनका के स्वामित्व वाली कंपनी केइसी इंटरनेशनल के लिए काम करते थे.
विदेश मंत्री के हस्तक्षेप के बाद कंपनी ने अगवा किए गए मज़दूरों के परिजनों को वेतन देना शुरू कर दिया है. हालांकि परिजनों को मीडिया से बात नहीं करने की हिदायत दी गई है.
अपहरण के तुरंत बाद कंपनी ने इस प्रकरण पर आज तक अपना आधिकारिक पक्ष नहीं रखा है.
केइसी इंटरनेशनल आरपी गोयनका (आरपीजी) समूह की कंपनी है जिसे अफ़ग़ानिस्तान में बिजली की ट्रांसमिशन लाइन लगाने का ठेका मिला हुआ है. वहां काम करने के लिए झारखंड के कई लोग अफ़ग़ानिस्तान गए हैं. इनमें से अधिकतर लोग बगोदर के हैं.
भारत और अफ़ग़ानिस्तान की सरकारें अपहरण के छह महीने बाद भी इनका पता नहीं लगा सकी हैं. इस कारण इनके परिजन हताश हैं.
मुलिया देवी प्रसादी महतो की पत्नी हैं और वो महीनों से अपने पति के आने का इंतज़ार कर रही हैं. इनकी बेटी ने इसी साल दसवीं की परीक्षा पास की है. मुलिया देवी कहती हैं कि उनकी बेटी ने पढ़ाई छोड़ दी है.
मुलिया देवी कहती हैं, ''हमलोग ग़रीब हैं. मेरे पति इसलिए परदेस गए कि चार पैसा कमा कर बच्चों को ठीक से पढ़ाएंगे-लिखाएंगे. अब उनका पता ही नहीं चल रहा है. हमलोग कैसे ज़िंदा रहें. किस पर भरोसा करें. कौन वापस लाएगा मेरे पति को. अब तो पता ही नहीं चलता कि सरकार उन्हें छुड़ाने के लिए कुछ कर भी रही है या नहीं. मुझे मेरे पति से मिलवा दीजिए.''
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प्रसादी महतो के गांव के ही संतोष रजक इस मसले पर मोदी सरकार ने निराश हैं. उनका कहना है कि सरकार अफ़ग़ानिस्तान पर दबाव नहीं बना पा रही है.
महुरी गांव के हुलास महतो अफ़ग़ानिस्तान में अगवा भारतीय मज़दूरों में से एक हैं. यहां उनकी पत्नी प्रमिला देवी की हालत ख़राब होती जा रही है. वो पति के ग़म में ठीक से खा-पी भी नहीं रही हैं. उन्होंने बताया कि बच्चे जब पापा के बारे में पूछते हैं, तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता.
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपहरण के 40 दिन बाद अगवा किए गए मज़दूरों में से तीन की पत्नियों और प्रसादी महतो के बेटे से दिल्ली में मुलाक़ात की थी.
घाघरा गांव के प्रकाश महतो की पत्नी चमेली देवी उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल थीं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि विदेश मंत्री ने एक महीने के अंदर सभी का पता लगा लेने का आश्वासन दिया था.
झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी पिछले महीने इन मज़दूरों में से कुछ की पत्नियों से रांची में मुलाक़ात की थी. रघुवर दास ने इन्हें एक-एक लाख रुपए की मदद देने की घोषणा की थी, लेकिन यह पैसा अभी तक नहीं मिला है.
उनसे मिलने के बाद प्रमिला देवी ने बताया कि मुख्यमंत्री ने भी उनके अपहृत पति का पता जल्दी ही लगाने की बात कही थी, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ.
प्रवासी समूह के संचालक सिकंदर अली और बगोदर पश्चिम के मुखिया लक्ष्मण महतो ने बताया कि अफ़ग़ानिस्तान में अपहरण के बावजूद इस इलाक़े से मज़दूरों का पलायन नहीं रुका है. यहां बेरोज़गारी बड़ी समस्या है और लोग अभी भी अफ़ग़ानिस्तान जा रहे हैं.
Monday, November 5, 2018
सबसे ख़ुशहाल देश भूटान में क्यों बढ़ रहा अवसाद और ख़ुदकुशी
भूटान की पहचान पूरी दुनिया में ख़ुशहाल मुल्क के रूप में है. कहा जाता है कि भूटान की प्रगति का दर्शन जीडीपी (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्शन) नहीं जीएनच (ग्रॉस नेशनल हैपिनेस) है.
विदेशी पत्रकार भी इस बात को मानते हैं कि भूटान पूरी दुनिया में अनुपम है और पर्यावरण की कसौटी पर दुनिया के देश इसकी तुलना में पीछे छूट जाते हैं.
लेकिन इसका मतलब यह क़तई नहीं है कि भूटानी नागरिक व्यग्रता, अवसाद और मानसिक विकार से मुक्त हैं.
भूटान की राजधानी थिम्पू स्थित नेशनल रेफ़रल हॉस्पिटल के रिकॉर्ड से पता चलता है कि यहां व्यग्रता और अवसाद सबसे सामान्य मानसिक बीमारियां हैं. भूटान की वार्षिक हेल्थ बुलेटिन के अनुसार 2017 में मानसिक बीमारी से जुड़े 4,200 मामले सामने आए.
आत्महत्या के मामले में यह देश अब कोई अजनबी नहीं रहा. यहां हर साल आत्महत्या करने वालों की संख्या बढ़ रही है.
आपको ये भी रोचक लगेगा
भूटान की मुश्किल से 10 लाख की आबादी है. अगर यहां सैकड़ों लोग भी ख़ुदकुशी करते हैं तो जनसंख्या के अनुपात में ये आंकड़ा बहुत ज़्यादा है. भूटान में आत्महत्या के जो मामले दर्ज होते हैं उससे पता चलता है कि इसकी वजह अवसाद और मानसिक बीमारी रही है.
द डिप्लोमैट की एक रिपोर्ट के अनुसार इस देश में केवल चार मनोचिकित्सक हैं और कोई मनोवैज्ञानिक नहीं है. इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रशिक्षित काउंसलर भी हैं तो राजधानी तक ही सीमित हैं. इसके साथ ही सारे मनोचिकित्सक भी थिम्पू में ही हैं.
हाल के दिनों में भूटान की सरकार ने मानसिक सेहत पर बजट में भी बढ़ोतरी की है.
भूटान के स्वास्थ मंत्रालय ने अगले पांच साल के लिए मानसिक स्वास्थ्य पर 6 करोड़ के बजट का प्रस्ताव रखा है. कहा जा रहा है कि भूटान में मानसिक स्वास्थ्य सेवा के साथ शिक्षा और जागरुकता को लेकर बहुत काम करने की ज़रूरत है.
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भूटान की एक समस्या और है- भाषा. भूटान की राष्ट्र भाषा ज़ोंका है, लेकिन इसके साथ ही कई बोलियां भी हैं. कहा जा रहा है कि बोलियों और भाषा में मानसिक बीमारी या उसकी स्थिति को समझाने की क्षमता नहीं है.
से देश के दो मनोचिकित्सकों ने कहा है कि उनकी भाषा में मानसिक स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त शब्दावली नहीं हैं. मनोचिकित्सा पर भूटान में काम केवल दो दशक पहले शुरू हुआ.
मानसिक बीमारी में ज़्यादातर भूटानी नागरिक पागलपन के शिकार हैं. ज़ाहिर है पागलपन को लोग किसी कंलक की तरह देखते हैं. भूटान में शायद ही कभी मानसिक बीमारी पर बहस या कोई कैंपेन चलाया गया हो. हालांकि ग्रॉस नेशनल हैपीनेस में मानसिक सेहत को नौंवे नंबर पर रखा गया है.
भूटान में मानसिक स्वास्थ्य की चिंता स्वास्थ्य मंत्रालय की 2014 में ख़ुदकुशी पर आई रिपोर्ट के बाद से और बढ़ गई है. पिछली सरकार में स्वास्थ्य मंत्रालय ने आत्महत्या को रोकने के लिए एक तीन वर्षीय योजना बनाई थी.
इसका नाम था- नेशनल सुसाइड प्रिवेंशन प्रोग्राम (एनएसपीपी). भूटान में ख़ुदकुशी को रोकने के लिए कोई हेल्पलाइन नंबर नहीं है.
भूटान अपनी कई ख़ासियतों के लिए जाना जाता है. यह बौद्ध देश है जहां के संविधान में प्रगति के मायने ख़ुशहाली से जोड़ा गया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जिन देशों के लोग सबसे ज़्यादा आत्महत्या करते हैं, उनमें भूटान 21वें नंबर पर था.
विदेशी पत्रकार भी इस बात को मानते हैं कि भूटान पूरी दुनिया में अनुपम है और पर्यावरण की कसौटी पर दुनिया के देश इसकी तुलना में पीछे छूट जाते हैं.
लेकिन इसका मतलब यह क़तई नहीं है कि भूटानी नागरिक व्यग्रता, अवसाद और मानसिक विकार से मुक्त हैं.
भूटान की राजधानी थिम्पू स्थित नेशनल रेफ़रल हॉस्पिटल के रिकॉर्ड से पता चलता है कि यहां व्यग्रता और अवसाद सबसे सामान्य मानसिक बीमारियां हैं. भूटान की वार्षिक हेल्थ बुलेटिन के अनुसार 2017 में मानसिक बीमारी से जुड़े 4,200 मामले सामने आए.
आत्महत्या के मामले में यह देश अब कोई अजनबी नहीं रहा. यहां हर साल आत्महत्या करने वालों की संख्या बढ़ रही है.
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भूटान की मुश्किल से 10 लाख की आबादी है. अगर यहां सैकड़ों लोग भी ख़ुदकुशी करते हैं तो जनसंख्या के अनुपात में ये आंकड़ा बहुत ज़्यादा है. भूटान में आत्महत्या के जो मामले दर्ज होते हैं उससे पता चलता है कि इसकी वजह अवसाद और मानसिक बीमारी रही है.
द डिप्लोमैट की एक रिपोर्ट के अनुसार इस देश में केवल चार मनोचिकित्सक हैं और कोई मनोवैज्ञानिक नहीं है. इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रशिक्षित काउंसलर भी हैं तो राजधानी तक ही सीमित हैं. इसके साथ ही सारे मनोचिकित्सक भी थिम्पू में ही हैं.
हाल के दिनों में भूटान की सरकार ने मानसिक सेहत पर बजट में भी बढ़ोतरी की है.
भूटान के स्वास्थ मंत्रालय ने अगले पांच साल के लिए मानसिक स्वास्थ्य पर 6 करोड़ के बजट का प्रस्ताव रखा है. कहा जा रहा है कि भूटान में मानसिक स्वास्थ्य सेवा के साथ शिक्षा और जागरुकता को लेकर बहुत काम करने की ज़रूरत है.
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भूटान की एक समस्या और है- भाषा. भूटान की राष्ट्र भाषा ज़ोंका है, लेकिन इसके साथ ही कई बोलियां भी हैं. कहा जा रहा है कि बोलियों और भाषा में मानसिक बीमारी या उसकी स्थिति को समझाने की क्षमता नहीं है.
से देश के दो मनोचिकित्सकों ने कहा है कि उनकी भाषा में मानसिक स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त शब्दावली नहीं हैं. मनोचिकित्सा पर भूटान में काम केवल दो दशक पहले शुरू हुआ.
मानसिक बीमारी में ज़्यादातर भूटानी नागरिक पागलपन के शिकार हैं. ज़ाहिर है पागलपन को लोग किसी कंलक की तरह देखते हैं. भूटान में शायद ही कभी मानसिक बीमारी पर बहस या कोई कैंपेन चलाया गया हो. हालांकि ग्रॉस नेशनल हैपीनेस में मानसिक सेहत को नौंवे नंबर पर रखा गया है.
भूटान में मानसिक स्वास्थ्य की चिंता स्वास्थ्य मंत्रालय की 2014 में ख़ुदकुशी पर आई रिपोर्ट के बाद से और बढ़ गई है. पिछली सरकार में स्वास्थ्य मंत्रालय ने आत्महत्या को रोकने के लिए एक तीन वर्षीय योजना बनाई थी.
इसका नाम था- नेशनल सुसाइड प्रिवेंशन प्रोग्राम (एनएसपीपी). भूटान में ख़ुदकुशी को रोकने के लिए कोई हेल्पलाइन नंबर नहीं है.
भूटान अपनी कई ख़ासियतों के लिए जाना जाता है. यह बौद्ध देश है जहां के संविधान में प्रगति के मायने ख़ुशहाली से जोड़ा गया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जिन देशों के लोग सबसे ज़्यादा आत्महत्या करते हैं, उनमें भूटान 21वें नंबर पर था.
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