该中心隶属于英国政府通信总部(GCHQ)。该中心在报告中称,只能为目前在英国使用的华为设备的长期安全提供有限保证。
报告反映,对于华为公司未能解决已发现的问题,深感挫败。
华为为在英国运营的电信公司提供电信技术。这份报告是在英国政府决定是否允许华为建设下一代5G网络之前提出的。
美国一直以华为对构成国家安全为由,试图说服其它国家将华为排除在5G建设之外。
但是,英国最新发布的报告中并未指控华为蓄意设置“后门”或为中国政府进行任何形式的间谍活动。
相应地,报告指责的是,华为公司的不良操作造成漏洞,可能带来安全风险。
报告将其描述为,“华为工程中的重大技术问题。”
报告还表示,华为软件开发的一些做法“给英国运营商带来的风险可能显著增加”。
相关官员表示,严格的监督机制意味着可以减轻和管理这些风险。
但报告中还警告,目前的措施只能对如下目标提供有限的保证——华为参与英国核心网络所带来的所有风险在长期来看显著减少。
华为的设备通常比竞争对手的更便宜,但随之而来的担忧是,推动其快速增长的商业模式可能导致其产品不可靠。
由于华为为不同公司提供不同产品,对于主管安全的官员而言,很难确定所有的设备都符合同一安全标准。
自2010年华为首次与英国电信等运营商合作以来,英国就建立了一个华为网络安全评估中心,负责检查安装应用的华为设备和软件。
2014年,英国国家网络安全中心主任马丁(Ciaran Martin)成立了一个委员会,来监督华为的工作。
其他一些政府的代表,华为公司以及使用华为设备的公司的代表,也是该监督委员会的成员。
去年的年度报告中提出了一些担忧,但今年的报告高度批评了华为公司没能解决这些担忧。
华为曾表示,将在未来三至五年投入大量资金解决这些问题,但据了解目前为止官方还未看到任何可靠的执行计划。
这种情况引起了监督委员会对未来的担忧。“很难对未来在英国部署的产品进行适当的风险管理,直到华为的软件工程师和网络安全流程得到纠正。”
“监督委员会目前还未看到任何迹象使其相信华为有能力通过其转型计划带来改变。”
报告还强调,关于华为在未来5G建设中的角色,将在英国的数字、文化、媒体和体育部进行更广泛的审查后做出。
但是,报道的警告引发了一个严重的问题,即一家公司在现有系统上已被证明存在问题,那么是否应该允许它在下一代系统建设中扮演重要角色。
作为回应,华为一位代表称,公司理解关于其软件工程能力的担忧,并将“非常认真”地对待它们。
Friday, March 29, 2019
Monday, March 25, 2019
सीए बनाम अर्थशास्त्री विवाद में 'सही' कौन है?
हाल ही में देश और दुनिया के 108 अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि कुछ साल पहले तक भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर जुटाए जाने वाले आंकड़ों को विश्वसनीयता हासिल थी लेकिन बीते कुछ सालों से इन आंकड़ों और आंकड़े जुटाने वाली संस्थाओं पर राजनीतिक प्रभाव दिखाई दे रहा है.
इस मुद्दे पर देश-दुनिया के कई अर्थशास्त्रियों ने इसी महीने एक ओपन लेटर लिख कर सरकार पर हस्तक्षेप का आरोप लगाया था.
अर्थशास्त्रियों ने अपने इस पत्र में मौजूदा भारत सरकार के नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं.
इसके बाद भारत के 131 चार्टेड अकाउंटेंट्स (सीए) ने पत्र लिखकर अर्थशास्त्रियों के तर्कों को ख़ारिज करते हुए कहा है कि आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना आधारहीन है.
ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर सीए और अर्थशास्त्रियों के बीच छिड़े इस विवाद में भारत की आर्थिक हालत को लेकर किस वर्ग के आंकड़े सही है.
बीबीसी हिंदी ने यही समझने के लिए अर्थशास्त्र के जानकार और व्यापारिक मामलों की समझ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार शिशिर सिन्हा के साथ बात करके कुछ सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की है.
1 - सीए और अर्थशास्त्रियों में सही कौन है?
अर्थशास्त्री और सीए दोनों ही आंकड़ों को अपने-अपने नज़रिए से देखते हैं. ऐसे में पुख्ता तौर पर ये नहीं कहा जा सकता है कि भारत की आर्थिक हालत को लेकर सीए सही हैं या अर्थशास्त्री. हां ये ज़रूर ये कहा जा सकता है कि दोनों अपनी-अपनी तरह से सही हैं.
सीए आंकड़ों के स्रोत की सत्यता की जांच करते है कि स्रोत ठीक है या नहीं. वहीं, अर्थशास्त्री आंकड़ों को परिभाषित करने की कोशिश करते हैं.
लेकिन जब अर्थशास्त्री आंकड़ों को परिभाषित करने की कोशिश करते हैं तो कहीं न कहीं उनकी विचारधारा भी इसमें हावी हो जाती है. इसी वजह से ये कहा जा सकता है कि दोनों के अपने-अपने तर्क और दलील हैं.
ऐसे में ये कहना बहुत मुश्किल है कि दोनों में से कौन सही है और कौन ग़लत है? और दोनों की बात मानने वाले वर्ग अलग-अलग हैं. एक वर्ग अर्थशास्त्रियों की बात को सही मानेगा तो वहीं दूसरा वर्ग चार्टेड अकाउंटेंट की बात को सही मानता है.
2 - आम लोग इसका क्या मतलब निकालें?
अर्थशास्त्री आंकड़ों को अपने चश्मे से देखते हैं. अगर कोई ग्लास पानी से आधा भरा है तो एक अर्थशास्त्री कहेगा कि ग्लास आधा खाली है. वहीं, दूसरा अर्थशास्त्री कहेगा कि ग्लास आधा भरा है.
एक अर्थशास्त्री कहेगा कि जब विकास दर सात प्रतिशत है तो ये कैसे कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुज़र रही है. वहीं, दूसरा अर्थशास्त्री कहेगा कि हमारा इंप्लॉयमेंट रेट बढ़िया नहीं है. इस तरह से दो अर्थशास्त्री किसी भी एक आंकड़े की एक परिभाषा को लेकर एकमत नहीं हो सकते हैं.
क्योंकि वे आंकड़ों का मतलब निकालते समय अर्थशास्त्र के तमाम सिद्धांत और मॉडल्स को ध्यान में रखते हैं. और उनके आकलन में विचारधारा का पुट रहता है.
अब इस विवाद के बाद आम लोगों के लिए एक समस्या खड़ी होती है कि वे देश की आर्थिक हालत को किस तरह देखें.
ऐसे में इसका समाधान है कि आम लोग अपने स्तर पर आंकड़ों की बारीकियां समझने की कोशिश करें. और अपने आकलन को माइक्रो लेवल से शुरू करके मैक्रो लेवल तक ले जाएं तब वे किसी नतीजे पर पहुंच सकते हैं.
सरल शब्दों में कहें तो लोगों को ये देखना चाहिए कि उनके ग्राम, कस्बे या शहर में किसी एक साल में कितने युवाओं को रोजगार मिला और वर्तमान साल में कितने युवाओं को रोजगार मिला.
लेकिन इसमें ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि दोनों ही सालों में नौकरी करने के लिए तैयार युवाओं की संख्या (सैंपल साइज़) समान रखा जाए ताकि अंतर किसी भी तरह से भ्रमित करने वाला न हो.
इस आकलन के बाद राज्य और देश के आंकड़ों को लेकर किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है.
3 - क्या आर्थिक आंकड़ों पर राजनीतिक प्रभाव पड़ रहा है?
अर्थशास्त्रियों ने अपने खत में कहा है कि आंकड़ों पर राजनीतिक प्रभाव पड़ता हुआ दिख रहा है.
लेकिन ये पहला मौका नहीं है जब आंकड़ों पर राजनीतिक प्रभाव दिख रहा हो. जब भी इस तरह के आंकड़े आए हैं तो ये कहा जाता रहा है कि आंकड़ों को ठीक ढंग से पेश करने को लेकर राजनीतिक प्रभाव डाला गया है.
इसके साथ ही जब आंकड़े बुरे आते हैं तो कहा जाता है कि इन आंकड़ों को लेकर कहीं न कहीं किसी तरह का दुराग्रह रहा है.
इससे पहले की सरकारों में भी जब कोई आंकड़ा आता था तो कोई न कोई वर्ग ये कहता था कि राजनीतिक प्रभाव के कारण ये आंकड़ा अच्छा दिखाई दे रहा है.
और जब आंकड़े खराब होते थे तो कहा जाता था कि जानबूझकर आंकड़ों में कमी दिखाई गई है ताकि सरकार को नीचा दिखाया जा सके.
ऐसे में ये आरोप कोई पहली बार नहीं लगे हैं.
4 - क्या नीति आयोग ने अधिकार-क्षेत्र का उल्लंघन किया?
अर्थशास्त्रियों ने अपने खत में कहा है कि साल 2018 में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग और केंद्रीय सांख्यिकी विभाग ने दो प्रतिस्पर्धी बैक सिरीज़ डेटा तैयार किया था. इन दोनों में पिछले दशक के विकास को लेकर विराधाभास देखा गया.
इसके बाद राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के आंकड़ों को वेबसाइट से हटा लिया गया. और, इसके बाद केंद्रीय सांख्यिकी विभाग के आंकड़ों को नीति आयोग ने जारी किया.
अब इस मामले में नीति आयोग को बीच में नहीं आना चाहिए था. क्योंकि आंकड़ों को जारी करने का काम सांख्यिकी मंत्रालय के अंतर्गत आता है और ये काम उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए था.
नीति आयोग का काम आंकड़ों को लेकर सलाह देना है और आंकड़े को पेश करने की ज़िम्मेदारी उन्हें नहीं देनी चाहिए.
5 - आंकड़ों को लेकर क्या बाजीगरी की गई?
ये एक अहम सवाल है कि क्या विकास दर से जुड़े आंकड़ों को लेकर बाज़ीगरी की गई.
भारत में आंकड़ों के आकलन के लिए हर पांच सालों में आधार वर्ष बदला जाता है. पहले 2004-05 आधार वर्ष था. इसके बाद 2011-12 आधार वर्ष हुआ. अब एक बार फिर आधार वर्ष बदलने वाला है.
इस मुद्दे पर देश-दुनिया के कई अर्थशास्त्रियों ने इसी महीने एक ओपन लेटर लिख कर सरकार पर हस्तक्षेप का आरोप लगाया था.
अर्थशास्त्रियों ने अपने इस पत्र में मौजूदा भारत सरकार के नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं.
इसके बाद भारत के 131 चार्टेड अकाउंटेंट्स (सीए) ने पत्र लिखकर अर्थशास्त्रियों के तर्कों को ख़ारिज करते हुए कहा है कि आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना आधारहीन है.
ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर सीए और अर्थशास्त्रियों के बीच छिड़े इस विवाद में भारत की आर्थिक हालत को लेकर किस वर्ग के आंकड़े सही है.
बीबीसी हिंदी ने यही समझने के लिए अर्थशास्त्र के जानकार और व्यापारिक मामलों की समझ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार शिशिर सिन्हा के साथ बात करके कुछ सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की है.
1 - सीए और अर्थशास्त्रियों में सही कौन है?
अर्थशास्त्री और सीए दोनों ही आंकड़ों को अपने-अपने नज़रिए से देखते हैं. ऐसे में पुख्ता तौर पर ये नहीं कहा जा सकता है कि भारत की आर्थिक हालत को लेकर सीए सही हैं या अर्थशास्त्री. हां ये ज़रूर ये कहा जा सकता है कि दोनों अपनी-अपनी तरह से सही हैं.
सीए आंकड़ों के स्रोत की सत्यता की जांच करते है कि स्रोत ठीक है या नहीं. वहीं, अर्थशास्त्री आंकड़ों को परिभाषित करने की कोशिश करते हैं.
लेकिन जब अर्थशास्त्री आंकड़ों को परिभाषित करने की कोशिश करते हैं तो कहीं न कहीं उनकी विचारधारा भी इसमें हावी हो जाती है. इसी वजह से ये कहा जा सकता है कि दोनों के अपने-अपने तर्क और दलील हैं.
ऐसे में ये कहना बहुत मुश्किल है कि दोनों में से कौन सही है और कौन ग़लत है? और दोनों की बात मानने वाले वर्ग अलग-अलग हैं. एक वर्ग अर्थशास्त्रियों की बात को सही मानेगा तो वहीं दूसरा वर्ग चार्टेड अकाउंटेंट की बात को सही मानता है.
2 - आम लोग इसका क्या मतलब निकालें?
अर्थशास्त्री आंकड़ों को अपने चश्मे से देखते हैं. अगर कोई ग्लास पानी से आधा भरा है तो एक अर्थशास्त्री कहेगा कि ग्लास आधा खाली है. वहीं, दूसरा अर्थशास्त्री कहेगा कि ग्लास आधा भरा है.
एक अर्थशास्त्री कहेगा कि जब विकास दर सात प्रतिशत है तो ये कैसे कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुज़र रही है. वहीं, दूसरा अर्थशास्त्री कहेगा कि हमारा इंप्लॉयमेंट रेट बढ़िया नहीं है. इस तरह से दो अर्थशास्त्री किसी भी एक आंकड़े की एक परिभाषा को लेकर एकमत नहीं हो सकते हैं.
क्योंकि वे आंकड़ों का मतलब निकालते समय अर्थशास्त्र के तमाम सिद्धांत और मॉडल्स को ध्यान में रखते हैं. और उनके आकलन में विचारधारा का पुट रहता है.
अब इस विवाद के बाद आम लोगों के लिए एक समस्या खड़ी होती है कि वे देश की आर्थिक हालत को किस तरह देखें.
ऐसे में इसका समाधान है कि आम लोग अपने स्तर पर आंकड़ों की बारीकियां समझने की कोशिश करें. और अपने आकलन को माइक्रो लेवल से शुरू करके मैक्रो लेवल तक ले जाएं तब वे किसी नतीजे पर पहुंच सकते हैं.
सरल शब्दों में कहें तो लोगों को ये देखना चाहिए कि उनके ग्राम, कस्बे या शहर में किसी एक साल में कितने युवाओं को रोजगार मिला और वर्तमान साल में कितने युवाओं को रोजगार मिला.
लेकिन इसमें ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि दोनों ही सालों में नौकरी करने के लिए तैयार युवाओं की संख्या (सैंपल साइज़) समान रखा जाए ताकि अंतर किसी भी तरह से भ्रमित करने वाला न हो.
इस आकलन के बाद राज्य और देश के आंकड़ों को लेकर किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है.
3 - क्या आर्थिक आंकड़ों पर राजनीतिक प्रभाव पड़ रहा है?
अर्थशास्त्रियों ने अपने खत में कहा है कि आंकड़ों पर राजनीतिक प्रभाव पड़ता हुआ दिख रहा है.
लेकिन ये पहला मौका नहीं है जब आंकड़ों पर राजनीतिक प्रभाव दिख रहा हो. जब भी इस तरह के आंकड़े आए हैं तो ये कहा जाता रहा है कि आंकड़ों को ठीक ढंग से पेश करने को लेकर राजनीतिक प्रभाव डाला गया है.
इसके साथ ही जब आंकड़े बुरे आते हैं तो कहा जाता है कि इन आंकड़ों को लेकर कहीं न कहीं किसी तरह का दुराग्रह रहा है.
इससे पहले की सरकारों में भी जब कोई आंकड़ा आता था तो कोई न कोई वर्ग ये कहता था कि राजनीतिक प्रभाव के कारण ये आंकड़ा अच्छा दिखाई दे रहा है.
और जब आंकड़े खराब होते थे तो कहा जाता था कि जानबूझकर आंकड़ों में कमी दिखाई गई है ताकि सरकार को नीचा दिखाया जा सके.
ऐसे में ये आरोप कोई पहली बार नहीं लगे हैं.
4 - क्या नीति आयोग ने अधिकार-क्षेत्र का उल्लंघन किया?
अर्थशास्त्रियों ने अपने खत में कहा है कि साल 2018 में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग और केंद्रीय सांख्यिकी विभाग ने दो प्रतिस्पर्धी बैक सिरीज़ डेटा तैयार किया था. इन दोनों में पिछले दशक के विकास को लेकर विराधाभास देखा गया.
इसके बाद राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के आंकड़ों को वेबसाइट से हटा लिया गया. और, इसके बाद केंद्रीय सांख्यिकी विभाग के आंकड़ों को नीति आयोग ने जारी किया.
अब इस मामले में नीति आयोग को बीच में नहीं आना चाहिए था. क्योंकि आंकड़ों को जारी करने का काम सांख्यिकी मंत्रालय के अंतर्गत आता है और ये काम उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए था.
नीति आयोग का काम आंकड़ों को लेकर सलाह देना है और आंकड़े को पेश करने की ज़िम्मेदारी उन्हें नहीं देनी चाहिए.
5 - आंकड़ों को लेकर क्या बाजीगरी की गई?
ये एक अहम सवाल है कि क्या विकास दर से जुड़े आंकड़ों को लेकर बाज़ीगरी की गई.
भारत में आंकड़ों के आकलन के लिए हर पांच सालों में आधार वर्ष बदला जाता है. पहले 2004-05 आधार वर्ष था. इसके बाद 2011-12 आधार वर्ष हुआ. अब एक बार फिर आधार वर्ष बदलने वाला है.
Monday, March 18, 2019
न्यूज़ीलैंड: PM जैसिंडा की दरियादिली दुनिया भर में छाई
न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों में हुए "आतंकवादी" हमले ने जहां दुनिया को हैरान और दुखी किया, वहीं एक तस्वीर उस नकारात्मकता में सकारात्मकता की उम्मीद जगा रही है.
ये तस्वीर है देश की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न की. देश में मुस्लिमों और प्रवासियों के ख़िलाफ़ पनप रही नफ़रत के बीच प्रधानमंत्री अर्डर्न ने हमले में मारे गए लोगों के परिवारों से मुलाक़ात की और दुनिया को राजनीति में मानवता का संदेश दिया.
वो मुस्लिम परिवारों के पास हिजाब में पहुंचीं, उन्हें गले लगाया और मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी. उनके चेहरे पर मायूसी थी, आंखें नम.
उनकी इस तस्वीर ने दुनिया का ध्यान आकर्षित किया. ट्विटर पर लोग उन्हें "आतंक के दौर में सकारात्मक राजनीति का चेहरा" बता रहे हैं.
कई लोग दुनिया के दक्षिणपंथी नेताओं को उनसे करुणा और प्रेम का पाठ सीखने की नसीहत दे रहे हैं.
कामकाजी महिलाओं को संदेश
पीड़ित परिवारों से मुलाक़ात के बाद प्रधानमंत्री अर्डर्न ने कहा, "हम विविधता, करुणा और दया का प्रतिनिधित्व करते हैं. यह देश उनका घर है, जो हमारे मूल्यों को मानते हैं. यह उन शरणार्थियों का घर है, जिन्हें इसकी ज़रूरत है."
उनके इस बयान के बाद वो एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियों में आ गई हैं. इससे पहले वो अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियों में तब आई थीं, जब उन्होंने पिछले साल अक्तूबर में प्रधानमंत्री रहते हुए अपनी बेटी को जन्म दिया और वो संयुक्त राष्ट्र की बैठक में अपनी बेटी को गोद में लेकर शामिल हुई थीं.
उन्होंने दुनिया भर की कामकाजी महिला को यह संदेश दिया था कि नौकरी और ज़िम्मेदार पद पर रहते हुए भी एक महिला एक मां होने की ज़िम्मेदारी संभाल सकती है.
जुलाई 2017 में अर्डर्न का विपक्षी नेता के रूप में जब पहला दिन था तब वे एक टीवी शो में गई थीं. उस शो की होस्ट ने अर्डर्न से पूछा था कि वे करियर और बच्चे में से पहले क्या चुनेंगीं?
उस समय अर्डर्न ने कहा था, "यह एक महिला पर निर्भर करता है कि वह कब बच्चा चाहती है. यह तय नहीं करना चाहिए कि अगर वह नौकरी कर रही है तो उसे प्रेग्नेंट होने का अवसर नहीं मिलेगा."
कौन हैं जैसिंडा अर्डर्न
जैसिंडा अर्डर्न अक्टूबर 2017 में न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री बनी थीं. इस साल सितंबर में हुए चुनावों में अर्डर्न की लेबर पार्टी दूसरे स्थान पर रही थी.
चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिल पाया था और उन्होंने न्यूज़ीलैंड फ़र्स्ट पार्टी के नेता विंस्टन पीटर्स के समर्थन से सरकार बनाई थी.
पाकिस्तान की बेनज़ीर भूट्टो के बाद अर्डर्न दुनिया की दूसरी ऐसी प्रधानमंत्री रही हैं, जिन्होंने पद पर रहते हुए बच्चे को जन्म दिया है.
पिछले साल 21 जून को अर्डर्न ने अपनी बेटी नीव को जन्म दिया था. जब वो संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में शामिल होने न्यूयॉर्क गई थीं, तब उनकी बेटी महज चार महीने की थी.
वहां उन्हें कई अनचाही सलाह मिली थीं.
अर्डर्न ने कहा था, "मुझे बहुत सारी अनचाही सलाह मिली है. मुझे नहीं मालूम मैं इनका क्या करूंगी. हालांकि मैं सभी सलाह देने वालों को धन्यवाद देना चाहती हूं."
राजनीति में क़दम
जिस उम्र में आम युवतियां एक अदद नौकरी के सपने देखती हैं, जैसिंडा अर्डर्न उस उम्र में राजनीति में प्रवेश कर गई थीं.
28 साल की उम्र में उन्होंने न्यूज़ीलैंड की संसद में क़दम रखा. किसी ने इस बात की कल्पना तक नहीं की थी कि वो कभी देश की प्रधानमंत्री बन पाएंगी, पर 2008 से उनका क़द पार्टी के भीतर बढ़ता चला गया.
टीनेजर रहते हुए वो देश की लेफ्ट पार्टियों से जुड़ी थीं. वो देश के अंतिम वाम प्रधानमंत्री हेलन क्लार्क के कार्यालय में काम करती थीं. इसके अलावा वो ब्रिटेन में टोनी ब्लेयर की नीति सलाहकार भी रही थीं.
राजनीति में उन्हें क्या खींचता है, इस पर बात करते हुए कभी अर्डर्न ने कहा था कि "भूखे से संघर्ष करते बच्चे और बिना जूते के उनके पांव ने उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया."
वो अपने चुनावी अभियानों में इन असामनताओं की बात किया करती थीं.
उनकी राजनीति पर नज़र रखने वाले कोलिन जेम्स ने बीबीसी से कहा था, "अर्डर्न में आगे बढ़ने की क्षमता थी."
"कई लोग उन्हें सिर्फ़ एक ख़ूबसूत महिला के रूप में देखते थे, लेकिन मैंने उनमें एक बुद्धिमान मनुष्य देखा, जो चीज़ों के बारे में गहराई से सोचता है."
ये तस्वीर है देश की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न की. देश में मुस्लिमों और प्रवासियों के ख़िलाफ़ पनप रही नफ़रत के बीच प्रधानमंत्री अर्डर्न ने हमले में मारे गए लोगों के परिवारों से मुलाक़ात की और दुनिया को राजनीति में मानवता का संदेश दिया.
वो मुस्लिम परिवारों के पास हिजाब में पहुंचीं, उन्हें गले लगाया और मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी. उनके चेहरे पर मायूसी थी, आंखें नम.
उनकी इस तस्वीर ने दुनिया का ध्यान आकर्षित किया. ट्विटर पर लोग उन्हें "आतंक के दौर में सकारात्मक राजनीति का चेहरा" बता रहे हैं.
कई लोग दुनिया के दक्षिणपंथी नेताओं को उनसे करुणा और प्रेम का पाठ सीखने की नसीहत दे रहे हैं.
कामकाजी महिलाओं को संदेश
पीड़ित परिवारों से मुलाक़ात के बाद प्रधानमंत्री अर्डर्न ने कहा, "हम विविधता, करुणा और दया का प्रतिनिधित्व करते हैं. यह देश उनका घर है, जो हमारे मूल्यों को मानते हैं. यह उन शरणार्थियों का घर है, जिन्हें इसकी ज़रूरत है."
उनके इस बयान के बाद वो एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियों में आ गई हैं. इससे पहले वो अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियों में तब आई थीं, जब उन्होंने पिछले साल अक्तूबर में प्रधानमंत्री रहते हुए अपनी बेटी को जन्म दिया और वो संयुक्त राष्ट्र की बैठक में अपनी बेटी को गोद में लेकर शामिल हुई थीं.
उन्होंने दुनिया भर की कामकाजी महिला को यह संदेश दिया था कि नौकरी और ज़िम्मेदार पद पर रहते हुए भी एक महिला एक मां होने की ज़िम्मेदारी संभाल सकती है.
जुलाई 2017 में अर्डर्न का विपक्षी नेता के रूप में जब पहला दिन था तब वे एक टीवी शो में गई थीं. उस शो की होस्ट ने अर्डर्न से पूछा था कि वे करियर और बच्चे में से पहले क्या चुनेंगीं?
उस समय अर्डर्न ने कहा था, "यह एक महिला पर निर्भर करता है कि वह कब बच्चा चाहती है. यह तय नहीं करना चाहिए कि अगर वह नौकरी कर रही है तो उसे प्रेग्नेंट होने का अवसर नहीं मिलेगा."
कौन हैं जैसिंडा अर्डर्न
जैसिंडा अर्डर्न अक्टूबर 2017 में न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री बनी थीं. इस साल सितंबर में हुए चुनावों में अर्डर्न की लेबर पार्टी दूसरे स्थान पर रही थी.
चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिल पाया था और उन्होंने न्यूज़ीलैंड फ़र्स्ट पार्टी के नेता विंस्टन पीटर्स के समर्थन से सरकार बनाई थी.
पाकिस्तान की बेनज़ीर भूट्टो के बाद अर्डर्न दुनिया की दूसरी ऐसी प्रधानमंत्री रही हैं, जिन्होंने पद पर रहते हुए बच्चे को जन्म दिया है.
पिछले साल 21 जून को अर्डर्न ने अपनी बेटी नीव को जन्म दिया था. जब वो संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में शामिल होने न्यूयॉर्क गई थीं, तब उनकी बेटी महज चार महीने की थी.
वहां उन्हें कई अनचाही सलाह मिली थीं.
अर्डर्न ने कहा था, "मुझे बहुत सारी अनचाही सलाह मिली है. मुझे नहीं मालूम मैं इनका क्या करूंगी. हालांकि मैं सभी सलाह देने वालों को धन्यवाद देना चाहती हूं."
राजनीति में क़दम
जिस उम्र में आम युवतियां एक अदद नौकरी के सपने देखती हैं, जैसिंडा अर्डर्न उस उम्र में राजनीति में प्रवेश कर गई थीं.
28 साल की उम्र में उन्होंने न्यूज़ीलैंड की संसद में क़दम रखा. किसी ने इस बात की कल्पना तक नहीं की थी कि वो कभी देश की प्रधानमंत्री बन पाएंगी, पर 2008 से उनका क़द पार्टी के भीतर बढ़ता चला गया.
टीनेजर रहते हुए वो देश की लेफ्ट पार्टियों से जुड़ी थीं. वो देश के अंतिम वाम प्रधानमंत्री हेलन क्लार्क के कार्यालय में काम करती थीं. इसके अलावा वो ब्रिटेन में टोनी ब्लेयर की नीति सलाहकार भी रही थीं.
राजनीति में उन्हें क्या खींचता है, इस पर बात करते हुए कभी अर्डर्न ने कहा था कि "भूखे से संघर्ष करते बच्चे और बिना जूते के उनके पांव ने उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया."
वो अपने चुनावी अभियानों में इन असामनताओं की बात किया करती थीं.
उनकी राजनीति पर नज़र रखने वाले कोलिन जेम्स ने बीबीसी से कहा था, "अर्डर्न में आगे बढ़ने की क्षमता थी."
"कई लोग उन्हें सिर्फ़ एक ख़ूबसूत महिला के रूप में देखते थे, लेकिन मैंने उनमें एक बुद्धिमान मनुष्य देखा, जो चीज़ों के बारे में गहराई से सोचता है."
Friday, March 15, 2019
क्रिकेटर श्रीसंत ने कहा- सुप्रीम कोर्ट ने मुझे दी लाइफ़ लाइन
क्रिकेटर श्रीसंत ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 'लाइफ लाइन' दी है वो जल्दी से जल्दी क्रिकेट मैदान पर वापसी करना चाहते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने मैच फिक्सिंग मामले में बीसीसीआई की अनुशासन समिति की ओर से श्रीसंत पर लगाई गई आजीवन पाबंदी शुक्रवार को हटा दी.
केरल हाई कोर्ट ने श्रीसंत पर लगाए गए आजीवन प्रतिबंध को बरकरार रखा था. श्रीसंत ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अशोक भूषण और केएम जोसेफ की बैंच ने कहा है कि बीसीसीआई की अनुशासन समिति तीन महीने के दौरान श्रीसंत को दी गई सज़ा पर दोबारा विचार कर सकती है.
कोर्ट ने ये भी साफ़ किया कि सज़ा की अविधि तय करते वक्त समिति को श्रीसंत का पक्ष भी सुनना होगा.
श्रीसंत ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर खुशी जाहिर करते हुए कहा, " लाइफ बैन हटना बहुत अच्छी बात है. सुप्रीम कोर्ट ने अच्छा लाइफ लाइन दिया है. अच्छा है कि मुझे एक अवसर दिया है. मैं पूरी तरह से फिट हूं. क्रिकेट मेरी रोजी रोटी है. मैं वापस खेलना चाहता हूं."
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि इस फ़ैसले का दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित आपराधिक मामले पर कोई असर नहीं होगा. हाई कोर्ट में दिल्ली पुलिस ने निचली अदालत के फ़ैसले के चुनौती दी है. इस फ़ैसले में कोर्ट ने साल 2013 के आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग के मामले में श्रीसंत समेत सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया था.
श्रीसंत साल 2007 में वर्ल्ड ट्वेंटी-20 और साल 2011 में वनडे वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम के सदस्य रहे हैं.
इस बारे में पाकिस्तानी वायु सेना ने आधिकारिक तौर पर तो कुछ नहीं कहा लेकिन पाकिस्तानी मीडिया की रिपोर्टों से पता चलता है कि इस कार्रवाई में पाकिस्तान ने चीन के सहयोग से बने स्वदेशी लड़ाकू विमान जेएफ़-17 थंडर का इस्तेमाल किया था.
ख़तरनाक और अहम बात ये है कि भारत के एसयू-30 और पाकिस्तान के जेएफ़-थंडर, ये दोनों ही लड़ाकू विमान परमाणु हथियार ले जाने की क्षमता रखते हैं. दोनों ही देशों की वायु सेनाओं के पास ये क्षमता नहीं है कि तुरंत इस बात का पता कर लें कि हमलावर लड़ाकू विमान परमाणु हथियारों से लैस है या नहीं.
जब रडार किसी हमलावर विमान का पता लगाएगा तो ये ही माना जाएगा कि वो अपने साथ परमाणु हथियार भी ला रहा होगा. दोनों ही देशों की वायु सेनाएं हमलावर लड़ाकू विमान के बारे में यही शक करेंगी.
ठीक इसी तरह पाकिस्तानी सेना के लिए भी ये जान लेना संभव नहीं है कि उसके ख़िलाफ़ दाग़े जाने वाले मिज़ाइल पारपंरिक हथियारों से लैस हैं या परमाणु हथियारों से. जैसा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अपने भाषण में बताया था कि उनके पास इंडिया जैसी रिपोर्ट थी कि नियंत्रण रेखा के पास बहावलपुर सेक्टर में जैश-ए-मोहम्मद को नुक़सान पहुंचाने के लिए मिसाइल से हमला होना था. इसी तरह की जानकारी कई अन्य सूत्रों के हवाले से भी सामने आई थी.
पाकिस्तान और भारत की सेनाएं किसी दाग़े गए मिसाइल का पता तब ही लगा सकती हैं जब वो उनकी अपनी सरहद में दाख़िल हो जाए. रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्थिति में मिसाइल को ख़त्म करने के लिए देश के पास सिर्फ़ चार मिनट का ही समय होता है.
पाकिस्तानी अधिकारियों के मुताबिक इतिहास में जब भी सैन्य तनाव या जंगी माहौल पैदा हुआ तब वो तुरंत ही आख़िरी हदों तक नहीं पहुंचा था बल्कि तनाव धीरे-धीरे बढ़ा था. लेकिन इस बार हालात बिलकुल अलग थे जिसमें दोनों ही सेनाएं शुरुआत में ही आख़िरी विकल्पों तक पहुंच गईं.
भारत के बयान पर यक़ीन करती है दुनिया
पाकिस्तान ने इन हालात से अपने लिए दूसरा सबक ये सीखा है कि तनाव के दौरान दुनिया भारत की इस मांग पर सहमत होती नज़र आती है कि पाकिस्तान अपनी ज़मीन से आतंकवादियों के नेटवर्क को ख़त्म करे.
भारत प्रतिबंधित संगठनों की सूची में शामिल जैश-ए-मोहम्मद और जमात-उद-दावा के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी सरकार की ओर से की गई हालिया कार्रवाइयों को महज़ अंतरराष्ट्रीय दबाव का नतीजा ही मानता है.
एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी के मुताबिक पाकिस्तान के नीति निर्माताओं को इस हक़ीक़त को समझने की ज़रूरत है कि सरकार के ढांचे से बाहर से काम करने वाले संगठनों (नॉन स्टेट एक्टर्स) की वजह से पाकिस्तान की कोशिशों का वो फल भी ज़ाया हो सकता है जो उसने बड़ी महेनत से दहशतगर्दी के ख़ात्मे की ज़द्दोजहद में हासिल किया है.
भारत के लड़ाकू विमानों के पाकिस्तान के वायुक्षेत्र का उल्लंघन करने पर पाकिस्तान के क़रीबी दोस्त भी इस बार खुल कर सामने नहीं आए. इन हालातों ने पाकिस्तानी सरकार और सेना को तेज़ी से कार्रवाई पर आमदा किया कि ऐसे तत्व उनकी उस मेहनत पर भी पानी फेर रहे हैं जो पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने पाकिस्तान के अलग अलग संगठनों के ख़िलाफ़ की थी.
सुप्रीम कोर्ट ने मैच फिक्सिंग मामले में बीसीसीआई की अनुशासन समिति की ओर से श्रीसंत पर लगाई गई आजीवन पाबंदी शुक्रवार को हटा दी.
केरल हाई कोर्ट ने श्रीसंत पर लगाए गए आजीवन प्रतिबंध को बरकरार रखा था. श्रीसंत ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अशोक भूषण और केएम जोसेफ की बैंच ने कहा है कि बीसीसीआई की अनुशासन समिति तीन महीने के दौरान श्रीसंत को दी गई सज़ा पर दोबारा विचार कर सकती है.
कोर्ट ने ये भी साफ़ किया कि सज़ा की अविधि तय करते वक्त समिति को श्रीसंत का पक्ष भी सुनना होगा.
श्रीसंत ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर खुशी जाहिर करते हुए कहा, " लाइफ बैन हटना बहुत अच्छी बात है. सुप्रीम कोर्ट ने अच्छा लाइफ लाइन दिया है. अच्छा है कि मुझे एक अवसर दिया है. मैं पूरी तरह से फिट हूं. क्रिकेट मेरी रोजी रोटी है. मैं वापस खेलना चाहता हूं."
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि इस फ़ैसले का दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित आपराधिक मामले पर कोई असर नहीं होगा. हाई कोर्ट में दिल्ली पुलिस ने निचली अदालत के फ़ैसले के चुनौती दी है. इस फ़ैसले में कोर्ट ने साल 2013 के आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग के मामले में श्रीसंत समेत सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया था.
श्रीसंत साल 2007 में वर्ल्ड ट्वेंटी-20 और साल 2011 में वनडे वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम के सदस्य रहे हैं.
इस बारे में पाकिस्तानी वायु सेना ने आधिकारिक तौर पर तो कुछ नहीं कहा लेकिन पाकिस्तानी मीडिया की रिपोर्टों से पता चलता है कि इस कार्रवाई में पाकिस्तान ने चीन के सहयोग से बने स्वदेशी लड़ाकू विमान जेएफ़-17 थंडर का इस्तेमाल किया था.
ख़तरनाक और अहम बात ये है कि भारत के एसयू-30 और पाकिस्तान के जेएफ़-थंडर, ये दोनों ही लड़ाकू विमान परमाणु हथियार ले जाने की क्षमता रखते हैं. दोनों ही देशों की वायु सेनाओं के पास ये क्षमता नहीं है कि तुरंत इस बात का पता कर लें कि हमलावर लड़ाकू विमान परमाणु हथियारों से लैस है या नहीं.
जब रडार किसी हमलावर विमान का पता लगाएगा तो ये ही माना जाएगा कि वो अपने साथ परमाणु हथियार भी ला रहा होगा. दोनों ही देशों की वायु सेनाएं हमलावर लड़ाकू विमान के बारे में यही शक करेंगी.
ठीक इसी तरह पाकिस्तानी सेना के लिए भी ये जान लेना संभव नहीं है कि उसके ख़िलाफ़ दाग़े जाने वाले मिज़ाइल पारपंरिक हथियारों से लैस हैं या परमाणु हथियारों से. जैसा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अपने भाषण में बताया था कि उनके पास इंडिया जैसी रिपोर्ट थी कि नियंत्रण रेखा के पास बहावलपुर सेक्टर में जैश-ए-मोहम्मद को नुक़सान पहुंचाने के लिए मिसाइल से हमला होना था. इसी तरह की जानकारी कई अन्य सूत्रों के हवाले से भी सामने आई थी.
पाकिस्तान और भारत की सेनाएं किसी दाग़े गए मिसाइल का पता तब ही लगा सकती हैं जब वो उनकी अपनी सरहद में दाख़िल हो जाए. रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्थिति में मिसाइल को ख़त्म करने के लिए देश के पास सिर्फ़ चार मिनट का ही समय होता है.
पाकिस्तानी अधिकारियों के मुताबिक इतिहास में जब भी सैन्य तनाव या जंगी माहौल पैदा हुआ तब वो तुरंत ही आख़िरी हदों तक नहीं पहुंचा था बल्कि तनाव धीरे-धीरे बढ़ा था. लेकिन इस बार हालात बिलकुल अलग थे जिसमें दोनों ही सेनाएं शुरुआत में ही आख़िरी विकल्पों तक पहुंच गईं.
भारत के बयान पर यक़ीन करती है दुनिया
पाकिस्तान ने इन हालात से अपने लिए दूसरा सबक ये सीखा है कि तनाव के दौरान दुनिया भारत की इस मांग पर सहमत होती नज़र आती है कि पाकिस्तान अपनी ज़मीन से आतंकवादियों के नेटवर्क को ख़त्म करे.
भारत प्रतिबंधित संगठनों की सूची में शामिल जैश-ए-मोहम्मद और जमात-उद-दावा के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी सरकार की ओर से की गई हालिया कार्रवाइयों को महज़ अंतरराष्ट्रीय दबाव का नतीजा ही मानता है.
एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी के मुताबिक पाकिस्तान के नीति निर्माताओं को इस हक़ीक़त को समझने की ज़रूरत है कि सरकार के ढांचे से बाहर से काम करने वाले संगठनों (नॉन स्टेट एक्टर्स) की वजह से पाकिस्तान की कोशिशों का वो फल भी ज़ाया हो सकता है जो उसने बड़ी महेनत से दहशतगर्दी के ख़ात्मे की ज़द्दोजहद में हासिल किया है.
भारत के लड़ाकू विमानों के पाकिस्तान के वायुक्षेत्र का उल्लंघन करने पर पाकिस्तान के क़रीबी दोस्त भी इस बार खुल कर सामने नहीं आए. इन हालातों ने पाकिस्तानी सरकार और सेना को तेज़ी से कार्रवाई पर आमदा किया कि ऐसे तत्व उनकी उस मेहनत पर भी पानी फेर रहे हैं जो पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने पाकिस्तान के अलग अलग संगठनों के ख़िलाफ़ की थी.
Monday, March 11, 2019
चुनाव खर्च में जुड़ेंगे सोशल मीडिया पर चुनावी विज्ञापन: पांच बड़ी ख़बरें
केंद्रीय चुनाव आयोग ने आगामी लोकसभा चुनाव के दौरान सोशल मीडिया पर जारी होने वाले राजनीतिक विज्ञापनों को चुनावी दलों के प्रचार खर्च में जोड़ने की घोषणा कर दी है.
मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कहा है कि इस चुनाव के दौरान सोशल मीडिया पर आचार संहिता लागू होगी, सोशल मीडिया पर कैंपेनिंग का ख़र्च भी जोड़ा जाएगा.
इसके साथ ही सोशल मीडिया कंपनियों को राजनीति विज्ञापन जारी करने की जानकारी चुनाव आयोग को देनी होगी. चुनाव आयोग की स्वीकृति के बाद ही सोशल मीडिया पर विज्ञापनों को चलाया जा सकेगा.
प्रधानमंत्री बनने की इच्छा नहीं: नितिन गडकरी
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर अपनी ओर से स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है.
समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि उनकी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा नहीं है और न ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसी कोई योजना बना रहा है.
उन्होंने कहा, "मैंने कभी भी अपने काम और राजनीति को लेकर कोई गणित नहीं लगाया हैं. मैं तो चला, जिधर रास्ता चला. जो काम दिखा करता गया. मैं देशहित में काम करने में यकीन करता हूं. मैं सपने नहीं देखता. न ही मैं किसी के पास जाकर अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए कहता हूं. मैं दिल से बता रहा हूं कि मैं इस रेस में नहीं हूं."
मोहाली में खेले गए ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ चौथे वनडे में हार के बाद टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली ने डीआरएस सिस्टम के प्रति अपनी नाराज़गी जताई है.
मैच के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोहली ने कहा, "आज डीआरएस कॉल ने हम सभी को चौंका दिया है. आजकल अधिकतर मैचों में डीआरएस सिस्टम द्वारा ग़लत फ़ैसले दिया जाना चर्चा का विषय बना हुआ है."
डीआरएस का ज़िक्र करते हुए कोहली ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज एश्टन टर्नर को नॉट आउट दिए जाने पर अपनी असहजता जता रहे थे.
इस मैच में टर्नर जब 41 रन बनाकर खेल रहे थे तो भारतीय खिलाड़ी ऋषभ पंत ने विकेट के पीछे कैच लेने के बाद ज़ोरदार अपील की.
लेकिन मैदान में उपस्थित अंपायर ने उन्हें नॉट-आउट करार दिया.
इसके बाद थर्ड अंपायर से अपील की गई. लेकिन थर्ड अंपायर ने भी टर्नर को आउट घोषित नहीं किया.
अल्जीरिया के राष्ट्रपति अब्देलअज़ीज बोटलिक स्विटज़रलैंड से अपने देश लौट आए हैं.
बीते एक महीने से अल्जीरिया में राष्ट्रपति के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं.
अब्देलअज़ीज को साल 2013 में दिल का दौरा पड़ा था तब से वे बहुत कम आम लोगों के सामने आए हैं.
वे बीते 20 साल के अल्जीरिया के राष्ट्रपति हैं और वे पांचवीं बार देश की सत्ता संभालने पर विचार कर रहे हैं, इसी बात पर अल्जीरिया में भारी विरोध हो रहा है.
रूस शुरू करेगा अपनी इंटरनेट सेवा
रूस में कई लोग सरकार के उस फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं जिसमें सरकार ने कहा है कि वे देश की इंटरनेट सेवा को बाकी दुनिया से अलग कर देगी.
इस फ़ैसले के विरोध में रविवार को सैकड़ों लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया. कार्यकर्ताओं ने दावा किया लगभग 1500 लोग विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए. यह आंकड़ा पुलिस के अनुमान से दोगुना है.
सरकार का कहना है कि इसके ज़रिए रूस अपनी खुद की इंटरनेट सेवा शुरू करेगा और वह अमरीका के सर्वर पर निर्भर नहीं रहेगा.
वहीं, दूसरी ओर इस फ़ैसले के आलोचकों का कहना है कि इसके ज़रिए सरकार सेंसरशिप को बढ़ावा देना चाहती है. एक रूसी छात्रा मैरिल वीएरमर्स ने कहा कि इस प्रस्तावित क़ानून को परखने की ज़रूरत है.
मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कहा है कि इस चुनाव के दौरान सोशल मीडिया पर आचार संहिता लागू होगी, सोशल मीडिया पर कैंपेनिंग का ख़र्च भी जोड़ा जाएगा.
इसके साथ ही सोशल मीडिया कंपनियों को राजनीति विज्ञापन जारी करने की जानकारी चुनाव आयोग को देनी होगी. चुनाव आयोग की स्वीकृति के बाद ही सोशल मीडिया पर विज्ञापनों को चलाया जा सकेगा.
प्रधानमंत्री बनने की इच्छा नहीं: नितिन गडकरी
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर अपनी ओर से स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है.
समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि उनकी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा नहीं है और न ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसी कोई योजना बना रहा है.
उन्होंने कहा, "मैंने कभी भी अपने काम और राजनीति को लेकर कोई गणित नहीं लगाया हैं. मैं तो चला, जिधर रास्ता चला. जो काम दिखा करता गया. मैं देशहित में काम करने में यकीन करता हूं. मैं सपने नहीं देखता. न ही मैं किसी के पास जाकर अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए कहता हूं. मैं दिल से बता रहा हूं कि मैं इस रेस में नहीं हूं."
मोहाली में खेले गए ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ चौथे वनडे में हार के बाद टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली ने डीआरएस सिस्टम के प्रति अपनी नाराज़गी जताई है.
मैच के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोहली ने कहा, "आज डीआरएस कॉल ने हम सभी को चौंका दिया है. आजकल अधिकतर मैचों में डीआरएस सिस्टम द्वारा ग़लत फ़ैसले दिया जाना चर्चा का विषय बना हुआ है."
डीआरएस का ज़िक्र करते हुए कोहली ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज एश्टन टर्नर को नॉट आउट दिए जाने पर अपनी असहजता जता रहे थे.
इस मैच में टर्नर जब 41 रन बनाकर खेल रहे थे तो भारतीय खिलाड़ी ऋषभ पंत ने विकेट के पीछे कैच लेने के बाद ज़ोरदार अपील की.
लेकिन मैदान में उपस्थित अंपायर ने उन्हें नॉट-आउट करार दिया.
इसके बाद थर्ड अंपायर से अपील की गई. लेकिन थर्ड अंपायर ने भी टर्नर को आउट घोषित नहीं किया.
अल्जीरिया के राष्ट्रपति अब्देलअज़ीज बोटलिक स्विटज़रलैंड से अपने देश लौट आए हैं.
बीते एक महीने से अल्जीरिया में राष्ट्रपति के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं.
अब्देलअज़ीज को साल 2013 में दिल का दौरा पड़ा था तब से वे बहुत कम आम लोगों के सामने आए हैं.
वे बीते 20 साल के अल्जीरिया के राष्ट्रपति हैं और वे पांचवीं बार देश की सत्ता संभालने पर विचार कर रहे हैं, इसी बात पर अल्जीरिया में भारी विरोध हो रहा है.
रूस शुरू करेगा अपनी इंटरनेट सेवा
रूस में कई लोग सरकार के उस फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं जिसमें सरकार ने कहा है कि वे देश की इंटरनेट सेवा को बाकी दुनिया से अलग कर देगी.
इस फ़ैसले के विरोध में रविवार को सैकड़ों लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया. कार्यकर्ताओं ने दावा किया लगभग 1500 लोग विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए. यह आंकड़ा पुलिस के अनुमान से दोगुना है.
सरकार का कहना है कि इसके ज़रिए रूस अपनी खुद की इंटरनेट सेवा शुरू करेगा और वह अमरीका के सर्वर पर निर्भर नहीं रहेगा.
वहीं, दूसरी ओर इस फ़ैसले के आलोचकों का कहना है कि इसके ज़रिए सरकार सेंसरशिप को बढ़ावा देना चाहती है. एक रूसी छात्रा मैरिल वीएरमर्स ने कहा कि इस प्रस्तावित क़ानून को परखने की ज़रूरत है.
Monday, March 4, 2019
सैनिक कैसे जाने कि जंग देश के लिए है या सरकार के लिए: ब्लॉग
ये ठीक है कि कुछ डर अच्छे होते हैं मगर बहुत से डर अच्छे नहीं भी होते.
जब परमाणु शक्ति राहत और प्रगति का हथियार बनने की बजाय एक आसेब यानी प्रेत की तरह सीमाओं के आर-पार उन करोड़ों लोगों को डराने लगे जिनके पास जीवन को खोने के डर के सिवाय कुछ भी नहीं, तो यह डर अच्छा नहीं है.
जब सिपाही के दिल में यह सवाल लहराने लगे कि वो देश के लिए जान दे रहा है या किसी सरकार के लिए और क्या ये देश और सरकार भी उसके बाद उसके परिवार का पूरी तरह से ध्यान रखेंगे या उसके परिवार को अपने हाल पर छोड़ देंगे तो ऐसा कोई भी डर अच्छा नहीं है.
जब मतदाता के मन में यह डर पैदा हो जाए कि मैं जिसे वोट दे रहा हूं वो इस वोट को अपने की वचन अमानत समझेगा या मेरे वोट को स्वार्थ प्रथा की सीढ़ी बना लेगा तो यह डर अच्छा नहीं है.
किसी भी दो देशों के संबंधों की नींव भले शक की ज़मीन, भय की ईंटों और अज्ञान के गारे से उठे मगर एक-दूसरे को समझने के लिए दिमाग़ की हर खिड़की बंद कर दी जाए और ये खिड़की कभी न खुलने का डर दिल में बैठता जाए तो यह डर अच्छा नहीं है.
जब यह डर पैदा हो जाए कि सिर्फ़ एक आतंकवादी अपनी सिर्फ़ एक ज़हरीली हरक़त से पूरे-पूरे देशों की व्यवहारिक बुद्धि को अपने नापाक एजेंडे का बंधक बनाने के लिए काफ़ी है तो यह डर अच्छा नहीं है.
जब ये डर पैदा हो जाए कि मीडिया किसी भी घटना से फैलने वाले डर को कम करने और डरने वालों को हौसला देने और इस घटना की तह में जाने और खोज करने के बजाय मुंह में रेटिंग का पेट्रोल भरकर आसमान की तरफ़ मुंह करके शोले निकालना शुरू कर देगा तो यह सोच-सोचकर जो डर पैदा होता है वो अच्छा नहीं है.
यक़ीन न आए तो रवांडा का उदाहरण हाज़िर है. जहां रेडियो और चैनलों ने हुतुओं और तुर्सियों की आड़ में लाख-लाख लाशें गिरवा दीं और दामन पर एक छींट भी नहीं आई.
जब मैं सिर्फ़ इस डर के मारे भीड़ का हिस्सा बन जाऊं कि अगर मैं भीड़ का हिस्सा नहीं बना तो मारा जाऊंगा या मेरा हुक्का-पानी बंद हो जाएगा या चलना-फिरना दूभर हो जाएगा तो यह डर अच्छा नहीं है.
जब मुझे लोकतंत्र के ख़्वाब में भी फासिज़्म का शैतान आ-आकर डराने लगे तो यह डर अच्छा नहीं है. जब मैं सामने वाले को इस डर से मार दूं कि मुझे किसी ने बताया है कि मैंने अगर उसे आज नहीं मारा तो एक दिन वो मुझे मार देगा तो यह डर न तो मेरे लिए अच्छा है और न तो सामने वाले के लिए.
ये डर सिर्फ़ उसके लिए अच्छा है जिसके पास डराने के अलावा कोई दूसरा हथियार नहीं. कोई कभी ये भी तो बताए कि डर को कैसे मारा जाए ताकि डर ही डरकर भाग जाए.
ऐसा कोई न कोई तरीक़ा ज़रूर होगा, मगर फिर डराने वालों का क्या होगा और फिर डर के उत्पादन और उद्योग का क्या होगा कालिया?
जब परमाणु शक्ति राहत और प्रगति का हथियार बनने की बजाय एक आसेब यानी प्रेत की तरह सीमाओं के आर-पार उन करोड़ों लोगों को डराने लगे जिनके पास जीवन को खोने के डर के सिवाय कुछ भी नहीं, तो यह डर अच्छा नहीं है.
जब सिपाही के दिल में यह सवाल लहराने लगे कि वो देश के लिए जान दे रहा है या किसी सरकार के लिए और क्या ये देश और सरकार भी उसके बाद उसके परिवार का पूरी तरह से ध्यान रखेंगे या उसके परिवार को अपने हाल पर छोड़ देंगे तो ऐसा कोई भी डर अच्छा नहीं है.
जब मतदाता के मन में यह डर पैदा हो जाए कि मैं जिसे वोट दे रहा हूं वो इस वोट को अपने की वचन अमानत समझेगा या मेरे वोट को स्वार्थ प्रथा की सीढ़ी बना लेगा तो यह डर अच्छा नहीं है.
किसी भी दो देशों के संबंधों की नींव भले शक की ज़मीन, भय की ईंटों और अज्ञान के गारे से उठे मगर एक-दूसरे को समझने के लिए दिमाग़ की हर खिड़की बंद कर दी जाए और ये खिड़की कभी न खुलने का डर दिल में बैठता जाए तो यह डर अच्छा नहीं है.
जब यह डर पैदा हो जाए कि सिर्फ़ एक आतंकवादी अपनी सिर्फ़ एक ज़हरीली हरक़त से पूरे-पूरे देशों की व्यवहारिक बुद्धि को अपने नापाक एजेंडे का बंधक बनाने के लिए काफ़ी है तो यह डर अच्छा नहीं है.
जब ये डर पैदा हो जाए कि मीडिया किसी भी घटना से फैलने वाले डर को कम करने और डरने वालों को हौसला देने और इस घटना की तह में जाने और खोज करने के बजाय मुंह में रेटिंग का पेट्रोल भरकर आसमान की तरफ़ मुंह करके शोले निकालना शुरू कर देगा तो यह सोच-सोचकर जो डर पैदा होता है वो अच्छा नहीं है.
यक़ीन न आए तो रवांडा का उदाहरण हाज़िर है. जहां रेडियो और चैनलों ने हुतुओं और तुर्सियों की आड़ में लाख-लाख लाशें गिरवा दीं और दामन पर एक छींट भी नहीं आई.
जब मैं सिर्फ़ इस डर के मारे भीड़ का हिस्सा बन जाऊं कि अगर मैं भीड़ का हिस्सा नहीं बना तो मारा जाऊंगा या मेरा हुक्का-पानी बंद हो जाएगा या चलना-फिरना दूभर हो जाएगा तो यह डर अच्छा नहीं है.
जब मुझे लोकतंत्र के ख़्वाब में भी फासिज़्म का शैतान आ-आकर डराने लगे तो यह डर अच्छा नहीं है. जब मैं सामने वाले को इस डर से मार दूं कि मुझे किसी ने बताया है कि मैंने अगर उसे आज नहीं मारा तो एक दिन वो मुझे मार देगा तो यह डर न तो मेरे लिए अच्छा है और न तो सामने वाले के लिए.
ये डर सिर्फ़ उसके लिए अच्छा है जिसके पास डराने के अलावा कोई दूसरा हथियार नहीं. कोई कभी ये भी तो बताए कि डर को कैसे मारा जाए ताकि डर ही डरकर भाग जाए.
ऐसा कोई न कोई तरीक़ा ज़रूर होगा, मगर फिर डराने वालों का क्या होगा और फिर डर के उत्पादन और उद्योग का क्या होगा कालिया?
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