中新网5月23日电 近日,上汽通用汽车宣布推出“小排量动力总成超长质保计划”,面向旗下新一代1.3T、1.0T及1.3L小排量车型,提供针对发动机、变速箱等主要零部件的8年或16万公里的原厂质保服务。
据悉,在当前中国车市深度结构性调整的大环境中,上汽通用汽车并不急于通过价格战去搏杀市场,而是把目光投在服务上,以不断提升的用户体验来赢得消费者的信心。上汽通用汽车此次推出的“质享无忧——小排量动力总成超长质保计划”全面兼顾车辆各任所有者的权益,其质保承诺“对车”而“不对人”。无论用户是否是首任车主,只要车辆满足行驶里程低于16万公里且车辆累计使用年限短于8年,车辆的发动机、变速箱等部件都可以享受原厂质保服务。
有调查数据显示,中国消费者平均换车时间在5年到6年间,而车辆的年均行驶里程低于2万公里。这意味着,对于大多数用户而言,8年或16万公里的质保期已经完全覆盖了首任车主的用车周期,并充分考虑到了后续车主的体验和权益。
上汽通用汽车此次超长动力总成质保计划所涵盖的新一代1.3T、1.0T及1.3L三缸小排量车型,正是近年来上汽通用汽车整合全球优势资源,汇集智能科技,依托全球领先的智能制造和高标准全球供应链打造的精品车型。
2017年,上汽通用汽车基于“单缸最优”的设计理念,打造了新一代Ecotec智能双喷射涡轮增压发动机,其中,新一代1.3T Ecotec双喷射涡轮增压发动机凭借其高性能、高可靠、高科技,和低油耗、低排放、低重量的优势当选“‘中国心’2018年度十佳发动机”,并赢得了广大用户的认可。
2019年,上汽通用汽车加大力度推进Smart Propulsion智驱科技,引入了满足“国Ⅵ B”排放标准的通用汽车第八代Ecotec 系列1.3T及1.0T小排量发动机。该系列发动机创新引入35Mpa高压直喷系统、智能主动电控碳罐泵以及全球首创的电子水泵+电控球阀模块的ATM主动热管理系统等一系列业界领先智能科技,并通过了业内严苛的耐久性测试,实现了性能、油耗、排放与可靠性的统一。
据介绍,上汽通用汽车针对小排量发动机的“超长质保计划”,是对旗下紧凑型车、中型车用户的一份厚礼,这一承诺是源于上汽通用汽车对于新一代小排量驱动系统技术和品质的强大信心。基于这种自信,上汽通用汽车向最大数量用户群体郑重承诺:不必担心车辆的动力品质,也不必担心驱动系统的可靠性与安全性,所有问题都有企业承保。
近年来,上汽通用汽车积极践行“以客户为中心”的经营理念,通过不断创新,在用车和养车两方面提升客户体验。一方面,上汽通用汽车积极布局车联生态,推进企业车联网战略加速驶入“云时代”,于2018年为旗下三大品牌所有搭载车联应用车型的用户提供OnStar安吉星车联应用流量终身免费服务,解除用户的“流量焦虑”,堪称行业内含金量最高、覆盖用户规模最大的免费流量方案。
另一方面,在企业新愿景的引领下,上汽通用汽车创新升级服务理念和模式,于今年年初推出“7S模块化服务体系”,创新采用数字化新模式实现丰富的线上线下经销商服务和功能,以打造整合社区互动、粉丝运营及异业合作的新零售生态圈。
纵观上汽通用的这些创新举措,无论是每年24GB的车载应用免费流量、以“7S模块化服务体系”聚焦“用户体验”,还是为小排量动力总成提供8年或16万公里的“超长质保”,都彰显了企业以“用户需求驱动业务模式”的长期战略,为上汽通用汽车“以客户为中心”的经营理念写下了鲜明的注脚。
Friday, May 24, 2019
Friday, May 17, 2019
华人建筑传奇贝聿铭去世,享年102岁
贝聿铭被视为是当代最著名的建筑师之一。他的代表作品包括法国巴黎卢浮宫玻璃金字塔、美国华盛顿国家美术馆东馆和香港中银大厦等。他曾荣获1979年美国建筑学会金奖、1983年普利兹克建筑奖等。
1917年出生于中国一个望族家庭的贝聿铭,曾在香港和上海生活,成年后移居美国。他先后在麻省理工学院和哈佛大学就读建筑学。
移民美国
贝聿铭1917年4月26日出生于中国广州,随后在香港和上海等城市生活。他的父亲贝祖贻曾担任当时的中央银行总裁、中国银行总经理等职务。
上海外滩时髦的建筑,使他隐约对这一领域产生浓厚兴趣。贝聿铭曾回忆,捷克籍建筑师邬达克(Ladislav Hudek)设计的花园酒店是他当时最喜欢的建筑之一,楼高24层,拥有客房200多间。
1935年,贝聿铭前往美国。他没有依照父亲期望的那样学习金融,而是先后在宾夕法尼亚大学和麻省理工学院攻读建筑,并取得哈佛大学建筑硕士学位。
1942年,贝聿铭与来美国读书的中国留学生卢淑华(Eileen Loo)成婚。卢淑华随后成为其亲密的顾问和得力助手。
1948年,贝聿铭获得纽约房地产大亨威廉·泽肯多夫(William Zeckendorf)赏识,为其工作七年。在此期间,由他设计的第一个项目海湾石油大厦(Gulf Oil Building)完工,成为亚特兰大的地标建筑。
1955年,贝聿铭自立门户,与合伙人成立了“贝聿铭及合伙人建筑师事务所”(I.M.Pei & Associates),随后两度更名后成为“贝-考伯-弗里德及合伙人建筑师事务所”(Pei Cobb Freed & Partners)。
在初期,贝聿铭的作品不以玻璃为主要建材,而是采用混凝土,包括1963年完工的纽约基普斯湾广场(Kips Bay Plaza)、1964年完工的费城社会山塔(Society Hill Towers)和1967年完工的纽约银塔(Silver Towers)。
贝聿铭第一个被普遍认可的项目,是1967年落成的位于科罗拉多州的国家大气研究中心。随后,他继续设计了达拉斯市政厅和国家美术馆(National Gallery of Art)东馆。
位于华盛顿的国家美术馆东馆被采用三角形的设计方案,与周边环境和谐一致,被誉为美国70年代最成功的建筑之一,甚至连时任美国总统卡特也称赞其是“公众生活与艺术之间强烈联系的艺术象征”。
1968年,贝聿铭及合伙人亨利·柯布(Henry N. Cobb)参与设计了美国波士顿的汉考克大厦(John Hancock Tower)。当时,该建筑采用了大规模玻璃幕墙,但由于当时玻璃幕墙技术不够成熟,建成初期曾经出现过玻璃脱落的事故。
香山饭店和中银大厦
1979年,贝聿铭开始设计位于北京西山的香山饭店。当时,该项目被视为是中国改革开放后,外籍设计师在中国进行的首个作品。
经过细致考察,贝聿铭认为,香山饭店的设计必须体现中国建筑艺术的精华,他因此采取传统的园林风格与现代风格相结合的方式,饭店采用玻璃天顶,主体后是曲径通幽的中式园林。
不过,香山饭店高额的造价以及对部分自然景观的破坏,也使该项目一度引发非议。
贝聿铭在华人地区的另一件著名作品,是他设计的香港中银大厦。1982年,中国银行在香港筹建总部大厦,由于贝聿铭的父亲贝祖贻便是中国银行的创始人之一,中银大厦的建设对于贝聿铭来说意义非凡。
由于中银大厦位于香港核心商业地带中环,楼高加上当地台风季节强劲的风力,使得建筑物的结构系统需要特别的设计。
此外,贝聿铭还曾回忆,由于香港人笃信风水,其为大厦设计的尖角亦备受指责“会带来厄运”。不过八年后,中银大厦最终落成,成为香港当时的第一高楼。
贝聿铭曾说,“如果有一件事我知道我没有做错,那就是卢浮宫”。由他设计的巴黎卢浮宫金字塔,是他名气最大的作品之一。
1984年,法国大革命即将迎来200周年,时任法国总统弗朗索瓦·密特朗(François Mitterrand)亲自委托贝聿铭在这座曾经的法国王宫前进行扩建工程。
然而,金字塔方案一经公布便引发轩然大波。很多人质疑,玻璃的设计会破坏这座数百年历史的古建筑风格。但在1989年,塔高21米,底宽34米,四个侧面由673块菱形玻璃拼组而成的玻璃金字塔最终建成。
人们惊喜地看到,当进入金字塔后,透过玻璃可以看到古典主义的老卢浮宫墙面和巴黎随日光变幻的美丽天空,地下展厅也因日光而更加明亮。
1917年出生于中国一个望族家庭的贝聿铭,曾在香港和上海生活,成年后移居美国。他先后在麻省理工学院和哈佛大学就读建筑学。
移民美国
贝聿铭1917年4月26日出生于中国广州,随后在香港和上海等城市生活。他的父亲贝祖贻曾担任当时的中央银行总裁、中国银行总经理等职务。
上海外滩时髦的建筑,使他隐约对这一领域产生浓厚兴趣。贝聿铭曾回忆,捷克籍建筑师邬达克(Ladislav Hudek)设计的花园酒店是他当时最喜欢的建筑之一,楼高24层,拥有客房200多间。
1935年,贝聿铭前往美国。他没有依照父亲期望的那样学习金融,而是先后在宾夕法尼亚大学和麻省理工学院攻读建筑,并取得哈佛大学建筑硕士学位。
1942年,贝聿铭与来美国读书的中国留学生卢淑华(Eileen Loo)成婚。卢淑华随后成为其亲密的顾问和得力助手。
1948年,贝聿铭获得纽约房地产大亨威廉·泽肯多夫(William Zeckendorf)赏识,为其工作七年。在此期间,由他设计的第一个项目海湾石油大厦(Gulf Oil Building)完工,成为亚特兰大的地标建筑。
1955年,贝聿铭自立门户,与合伙人成立了“贝聿铭及合伙人建筑师事务所”(I.M.Pei & Associates),随后两度更名后成为“贝-考伯-弗里德及合伙人建筑师事务所”(Pei Cobb Freed & Partners)。
在初期,贝聿铭的作品不以玻璃为主要建材,而是采用混凝土,包括1963年完工的纽约基普斯湾广场(Kips Bay Plaza)、1964年完工的费城社会山塔(Society Hill Towers)和1967年完工的纽约银塔(Silver Towers)。
贝聿铭第一个被普遍认可的项目,是1967年落成的位于科罗拉多州的国家大气研究中心。随后,他继续设计了达拉斯市政厅和国家美术馆(National Gallery of Art)东馆。
位于华盛顿的国家美术馆东馆被采用三角形的设计方案,与周边环境和谐一致,被誉为美国70年代最成功的建筑之一,甚至连时任美国总统卡特也称赞其是“公众生活与艺术之间强烈联系的艺术象征”。
1968年,贝聿铭及合伙人亨利·柯布(Henry N. Cobb)参与设计了美国波士顿的汉考克大厦(John Hancock Tower)。当时,该建筑采用了大规模玻璃幕墙,但由于当时玻璃幕墙技术不够成熟,建成初期曾经出现过玻璃脱落的事故。
香山饭店和中银大厦
1979年,贝聿铭开始设计位于北京西山的香山饭店。当时,该项目被视为是中国改革开放后,外籍设计师在中国进行的首个作品。
经过细致考察,贝聿铭认为,香山饭店的设计必须体现中国建筑艺术的精华,他因此采取传统的园林风格与现代风格相结合的方式,饭店采用玻璃天顶,主体后是曲径通幽的中式园林。
不过,香山饭店高额的造价以及对部分自然景观的破坏,也使该项目一度引发非议。
贝聿铭在华人地区的另一件著名作品,是他设计的香港中银大厦。1982年,中国银行在香港筹建总部大厦,由于贝聿铭的父亲贝祖贻便是中国银行的创始人之一,中银大厦的建设对于贝聿铭来说意义非凡。
由于中银大厦位于香港核心商业地带中环,楼高加上当地台风季节强劲的风力,使得建筑物的结构系统需要特别的设计。
此外,贝聿铭还曾回忆,由于香港人笃信风水,其为大厦设计的尖角亦备受指责“会带来厄运”。不过八年后,中银大厦最终落成,成为香港当时的第一高楼。
贝聿铭曾说,“如果有一件事我知道我没有做错,那就是卢浮宫”。由他设计的巴黎卢浮宫金字塔,是他名气最大的作品之一。
1984年,法国大革命即将迎来200周年,时任法国总统弗朗索瓦·密特朗(François Mitterrand)亲自委托贝聿铭在这座曾经的法国王宫前进行扩建工程。
然而,金字塔方案一经公布便引发轩然大波。很多人质疑,玻璃的设计会破坏这座数百年历史的古建筑风格。但在1989年,塔高21米,底宽34米,四个侧面由673块菱形玻璃拼组而成的玻璃金字塔最终建成。
人们惊喜地看到,当进入金字塔后,透过玻璃可以看到古典主义的老卢浮宫墙面和巴黎随日光变幻的美丽天空,地下展厅也因日光而更加明亮。
Wednesday, May 8, 2019
लोकसभा चुनाव 2019: निर्भया के माता-पिता पूछ रहे हैं, 'क्यों वोट दें? किसके लिए वोट दें?'
कुंवर नारायण की लिखी कविता की ये पंक्तियां तीन-चार बार पढ़िए और सामूहिक बलात्कार से जूझने वाली किसी महिला का रेखाचित्र ख़ुद-ब-ख़ुद आपकी आंखों के सामने आ जाएगा.
यहां कुंवर नारायण सामूहिक बालात्कार के होने को 'पूरे समाज का गुनहगार होना' बता रहे हैं और उनकी इसी बात को दुहरा रहे हैं 'निर्भया' के माता-पिता.
निर्भया. हां, वही निर्भया. 23 साल की वो लड़की जिसके साथ 16 दिसंबर, 2012 की रात को भारत की राजधानी दिल्ली में एक चलती बस में छह पुरुषों ने सामूहिक बलात्कार किया था.
किसी एक बलात्कार की दूसरे बलात्कार से तुलना नहीं की जा सकती. सभी बलात्कार अपने आप में बर्बर और जघन्य होते हैं लेकिन कई बलात्कार ऐसे होते हैं जिनकी बर्बरता को भारतीय क़ानून की जटिल भाषा में 'रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर' यानी 'जघन्यतम अपराध' कहा जाता है.
बलात्कार के ऐसे मामलों में अपराधियों के लिए फांसी की सज़ा का प्रावधान भी है. बलात्कार के मामलों में फांसी की सज़ा कितनी कारगर है, ये एक अलग बहस का मुद्दा है. वैसे भी जब मैं निर्भया के माता-पिता से मिलने उनके दो कमरों के फ़्लैट में घुसी तो ये बहस और तकनीकी सवाल मेरे ज़हन से लगभग ग़ायब हो चुके थे.
मेरा ध्यान बस उन कमरों के पर्दों, कमरों में लगी ट्यूबलाइट की मद्धिम और फीकी रोशनी सी मुस्कान लिए निर्भया की मां आशा देवी के चेहरे पर था. शाम के तक़रीबन पांच बजे होंगे और वो किचन में थीं.
दीवार पर शीशे की एक बड़ी शेल्फ़ लगी थी. शेल्फ़ में ढेरों ट्रॉफ़ियां, मोमेंटो और तस्वीरें थीं. एक तस्वीर निर्भया की मां और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात की भी थी. एक बोर्ड पर निर्भया मामले से जुड़ी ख़बरों वाले अख़बारों की कतरनों को सलीक़े से लगाया गया था.
निर्भया से जुड़ी इतनी चीज़ें घर में रखकर भला उसे भूल पाना कैसे मुमकिन होगा? मैंने ये बेवक़ूफ़ी भरा सवाल ख़ुद से पूछा और जवाब भी ख़ुद को ही दिया-ये चीज़ें घर में न होती तो क्या मां-बाप का दिल उसे भूला देता?
भावनाओं के इस समंदर से किसी तरह पार होते हुए मैंने आशा देवी और बद्रीनाथ से वो सवाल किया जिसका जवाब जानने के मक़सद से मैं उनके घर तक गई थी.
सवाल सुनकर आशा देवी ने रुंधी हुई आवाज़ में बोलना शुरू किया, "उस बच्ची को हमने अपने सामने एक-एक सांस छोड़ते देखा है. मरने से पहले उसे एक बूंद पानी तक नसीब नहीं हुआ. मांगती भी थी पानी, कहती थी प्यास लगी है...लेकिन नहीं दिया जाता था...सरकारें बदल गईं लेकिन हम उसी एक इंसाफ़ के लिए दौड़ रहे हैं. हमने परेशान होकर ये फ़ैसला लिया. कहा जाता है कि वोट देना हमारा अधिकार है...तो हमारा भी तो अधिकार है कि हमें इंसाफ़ मिले. हमने पांच साल तक बड़े धैर्य से इंतज़ार किया. हमें भरोसा था कि हमें इंसाफ़ मिलेगा लेकिन अगर महिलाओं की दुर्गति देखें तो आज भी हम 2012 में खड़े हैं."
निर्भया के पिता बद्रीनाथ अपनी पत्नी की बात आगे बढ़ाते हैं, "उस समय कहा जा रहा था कि अच्छे दिन आने वाले हैं, लेकिन हमारे लिए तो वही दिन और वही रात रह गए, अच्छे दिन तो आए ही नहीं. किसी ने हमसे कहा भी था कि ईवीएम में जगह होती है बटन दबाने के लिए, नोटा की, कि हम इन उम्मीदवारों का बहिष्कार करते हैं लेकिन हमने कहा कि हमें वहां जाने की ज़रूरत ही क्या है? हम धूप में क्यों जाएं वोट देने? हम अपने घर में रहेंगे. वोट नहीं देना है तो नहीं देना है."
उनके वोट न देने से किसी पार्टी या नेता को कोई फ़र्क़ पड़ेगा? इस बारे में बद्रीनाथ और आशा देवी दोनों की राय अलग है.
आशा देवी निराशा भरे स्वर में कहती हैं, "इतनी बच्चियां मर रही हैं, इतने क्राइम हो रहे हैं. किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता तो हमारे एक वोट न देने से उनको क्या फ़र्क़ पड़ेगा?"
अपनी पत्नी के उलट बद्रीनाथ के मन में अब भी थोड़ी सी उम्मीद बाक़ी है. उन्होंने कहा, "मेरी बेटी के बारे में दुनिया जानती है. मीडिया वाले हमारे पास आ रहे हैं, हमसे बात कर रहे हैं तो धीरे-धीरे बात उन तक भी पहुंचेगी. इसका कुछ न कुछ असर तो ज़रूर होना चाहिए."
दोनों की बात सुनते-सुनते मैंने दिल कड़ा करके उनसे एक और सवाल पूछा, "सुप्रीम कोर्ट ने तो सभी अपराधियों को फांसी की सज़ा सुना दी है. ऐसे में आपकी शिकायत किससे है? सरकार से? नेताओं से? राजनीतिक पार्टियों से या फिर न्याय व्यवस्था से?"
जवाब निर्भया के पिता देते हैं.
बड़े ही साफ़ लहजे में वो कहते हैं, "मेरी शिकायत किसी से नहीं है और शिकायत सबसे है. शिकायत सबसे इसलिए है क्योंकि किसी पार्टी ने अपने मेनिफ़ेस्टो में नहीं कहा है कि हम लड़कियों की सुरक्षा करेंगे...और वैसे देखेंगे तो पर्सनली हमें किसी से शिकायत नहीं है. रही बात हमारी बेटी की तो इतने बड़े मामले में जब सात साल के बाद अपराधियों को सज़ा नहीं हुई तो बाक़ी मामलों में हम क्या उम्मीद कर सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आ गया लेकिन अब भी हम अपनी लड़ाई लोवर कोर्ट में ही लड़ रहे हैं. इंसाफ़ मिलने की भी कोई समय सीमा होती है या नहीं?"
यहां कुंवर नारायण सामूहिक बालात्कार के होने को 'पूरे समाज का गुनहगार होना' बता रहे हैं और उनकी इसी बात को दुहरा रहे हैं 'निर्भया' के माता-पिता.
निर्भया. हां, वही निर्भया. 23 साल की वो लड़की जिसके साथ 16 दिसंबर, 2012 की रात को भारत की राजधानी दिल्ली में एक चलती बस में छह पुरुषों ने सामूहिक बलात्कार किया था.
किसी एक बलात्कार की दूसरे बलात्कार से तुलना नहीं की जा सकती. सभी बलात्कार अपने आप में बर्बर और जघन्य होते हैं लेकिन कई बलात्कार ऐसे होते हैं जिनकी बर्बरता को भारतीय क़ानून की जटिल भाषा में 'रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर' यानी 'जघन्यतम अपराध' कहा जाता है.
बलात्कार के ऐसे मामलों में अपराधियों के लिए फांसी की सज़ा का प्रावधान भी है. बलात्कार के मामलों में फांसी की सज़ा कितनी कारगर है, ये एक अलग बहस का मुद्दा है. वैसे भी जब मैं निर्भया के माता-पिता से मिलने उनके दो कमरों के फ़्लैट में घुसी तो ये बहस और तकनीकी सवाल मेरे ज़हन से लगभग ग़ायब हो चुके थे.
मेरा ध्यान बस उन कमरों के पर्दों, कमरों में लगी ट्यूबलाइट की मद्धिम और फीकी रोशनी सी मुस्कान लिए निर्भया की मां आशा देवी के चेहरे पर था. शाम के तक़रीबन पांच बजे होंगे और वो किचन में थीं.
दीवार पर शीशे की एक बड़ी शेल्फ़ लगी थी. शेल्फ़ में ढेरों ट्रॉफ़ियां, मोमेंटो और तस्वीरें थीं. एक तस्वीर निर्भया की मां और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात की भी थी. एक बोर्ड पर निर्भया मामले से जुड़ी ख़बरों वाले अख़बारों की कतरनों को सलीक़े से लगाया गया था.
निर्भया से जुड़ी इतनी चीज़ें घर में रखकर भला उसे भूल पाना कैसे मुमकिन होगा? मैंने ये बेवक़ूफ़ी भरा सवाल ख़ुद से पूछा और जवाब भी ख़ुद को ही दिया-ये चीज़ें घर में न होती तो क्या मां-बाप का दिल उसे भूला देता?
भावनाओं के इस समंदर से किसी तरह पार होते हुए मैंने आशा देवी और बद्रीनाथ से वो सवाल किया जिसका जवाब जानने के मक़सद से मैं उनके घर तक गई थी.
सवाल सुनकर आशा देवी ने रुंधी हुई आवाज़ में बोलना शुरू किया, "उस बच्ची को हमने अपने सामने एक-एक सांस छोड़ते देखा है. मरने से पहले उसे एक बूंद पानी तक नसीब नहीं हुआ. मांगती भी थी पानी, कहती थी प्यास लगी है...लेकिन नहीं दिया जाता था...सरकारें बदल गईं लेकिन हम उसी एक इंसाफ़ के लिए दौड़ रहे हैं. हमने परेशान होकर ये फ़ैसला लिया. कहा जाता है कि वोट देना हमारा अधिकार है...तो हमारा भी तो अधिकार है कि हमें इंसाफ़ मिले. हमने पांच साल तक बड़े धैर्य से इंतज़ार किया. हमें भरोसा था कि हमें इंसाफ़ मिलेगा लेकिन अगर महिलाओं की दुर्गति देखें तो आज भी हम 2012 में खड़े हैं."
निर्भया के पिता बद्रीनाथ अपनी पत्नी की बात आगे बढ़ाते हैं, "उस समय कहा जा रहा था कि अच्छे दिन आने वाले हैं, लेकिन हमारे लिए तो वही दिन और वही रात रह गए, अच्छे दिन तो आए ही नहीं. किसी ने हमसे कहा भी था कि ईवीएम में जगह होती है बटन दबाने के लिए, नोटा की, कि हम इन उम्मीदवारों का बहिष्कार करते हैं लेकिन हमने कहा कि हमें वहां जाने की ज़रूरत ही क्या है? हम धूप में क्यों जाएं वोट देने? हम अपने घर में रहेंगे. वोट नहीं देना है तो नहीं देना है."
उनके वोट न देने से किसी पार्टी या नेता को कोई फ़र्क़ पड़ेगा? इस बारे में बद्रीनाथ और आशा देवी दोनों की राय अलग है.
आशा देवी निराशा भरे स्वर में कहती हैं, "इतनी बच्चियां मर रही हैं, इतने क्राइम हो रहे हैं. किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता तो हमारे एक वोट न देने से उनको क्या फ़र्क़ पड़ेगा?"
अपनी पत्नी के उलट बद्रीनाथ के मन में अब भी थोड़ी सी उम्मीद बाक़ी है. उन्होंने कहा, "मेरी बेटी के बारे में दुनिया जानती है. मीडिया वाले हमारे पास आ रहे हैं, हमसे बात कर रहे हैं तो धीरे-धीरे बात उन तक भी पहुंचेगी. इसका कुछ न कुछ असर तो ज़रूर होना चाहिए."
दोनों की बात सुनते-सुनते मैंने दिल कड़ा करके उनसे एक और सवाल पूछा, "सुप्रीम कोर्ट ने तो सभी अपराधियों को फांसी की सज़ा सुना दी है. ऐसे में आपकी शिकायत किससे है? सरकार से? नेताओं से? राजनीतिक पार्टियों से या फिर न्याय व्यवस्था से?"
जवाब निर्भया के पिता देते हैं.
बड़े ही साफ़ लहजे में वो कहते हैं, "मेरी शिकायत किसी से नहीं है और शिकायत सबसे है. शिकायत सबसे इसलिए है क्योंकि किसी पार्टी ने अपने मेनिफ़ेस्टो में नहीं कहा है कि हम लड़कियों की सुरक्षा करेंगे...और वैसे देखेंगे तो पर्सनली हमें किसी से शिकायत नहीं है. रही बात हमारी बेटी की तो इतने बड़े मामले में जब सात साल के बाद अपराधियों को सज़ा नहीं हुई तो बाक़ी मामलों में हम क्या उम्मीद कर सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आ गया लेकिन अब भी हम अपनी लड़ाई लोवर कोर्ट में ही लड़ रहे हैं. इंसाफ़ मिलने की भी कोई समय सीमा होती है या नहीं?"
Thursday, May 2, 2019
救援任务:有如好莱坞电影的“南极救援行动”
2015年4月下旬,努特皮姆(Tim Nutbeam)带着一大袋血浆,登上了前往南极的救援飞机。此时正值南半球初冬,整个南极大陆被黑暗和严寒笼罩,强风频频来袭。由于气候条件恶劣,在为期半年的冬季里,一般不会安排任何航班在南极起降。
即便如此,英国急诊医学顾问努特皮姆还是同飞行员和工程师一起,飞赴南极。
他们是为了救助基地里一位生命垂危的患者。几天前,在哈雷研究站(Halley Research Station)工作的英国南极调查局工程师罗伯茨(Malcolm Roberts)肠胃严重出血,而最近的医院却在数千英里以外。
罗伯茨失血很多,但所幸挺过了前24小时。如果救援队伍能够及时赶到,那么他还有一线生机——但是前往南极的路道阻且长,很难说罗伯茨能不能逃过一劫。
冰冻坟场:南极洲死者的伤心故事
我们探险的动力是什么?
飞往哈雷研究站大约需要24小时,中途经停南极半岛的罗瑟拉基地(Rothera)加油。再加上回程,总共需要连续飞行48小时之久。返程途中还要应对患者的紧急状况,几乎没有时间休息睡觉。
单是拯救患者生命就已经不简单了,而与此同时,努特皮姆能否做好这次任务的心理准备?
最初并不是要派努特皮姆去,他只是后备医生,紧急救助开始后他飞到了智利最南端的蓬塔阿雷纳斯镇,按照计划是等救援飞机在那里着陆后提供协助。
但是,小镇以北的火山爆发,一切计划都被打乱。主治医生当时正在圣地亚哥等候转机,但所有航班都取消了。而智利南部与南极洲之间的德雷克海峡却出现了难得的好天气,海上能见度很理想。努特皮姆说:“我突然意识到该我去了,这是个千载难逢的好机会。”
事发突然,他承认当时甚至无暇思考可能发生的危险,只记得对前往南极救援激动无比。
极限探险者的品质
在南极冬天进行的医疗撤离屈指可数。2016年曾在24小时不见太阳的极夜里用飞机接走过一名病人,另一次是2010年从美国的研究主基地接走的。
英国曼彻斯特大学的心理学研究员史密斯(Nathan Smith)表示,参加极限探险的人通常是想要尝试大多数人所做不到的事情。他说:“这些人往往训练有素,因而将这当成是一次检验技能并尝试新任务的机会。”
面对极限探险的压力时,某些性格类型的人会更加自如。有研究显示,神经没那么敏感的人表现得更好。史密斯说:“我们发现,从事高危工作的人更不容易焦虑,即使焦虑也能控制好。”
这也与负责心有关。例如,一项研究调查了愿意尝试飞机抛物线飞行的人有哪些性格特质,结果发现责任心能让他们更好地应对极端的要求。人们普遍认为敢于尝试极限活动的人玩的就是心跳,但这项研究的结论恰好相反。史密斯说:“我们发现,这些人常常会花很多时间来降低风险,会尽力避免肾上腺素飙升,因为他们觉得这是一个危险信号。”
此次漫长的旅程中,努特皮姆和团队必须积极应对各种困难。譬如,努特皮姆需要全程监控血袋的温度,确保它处于有限的最佳温度范围之内。大家都挤在较为温暖的机头,机尾的温度则低至零下10摄氏度。他说:“我得找个合适的地方放置血袋,而且每小时都要检查一次。”
破晓时分,援救团队成功抵达哈雷基地,有一个半小时的时间将罗伯茨运上飞机,再晚天就黑得无法起飞了。气温已经到了零下30摄氏度,寒风将体感温度降得更低。努特皮姆坐着雪地摩托抵达基地,并在罗伯茨身上成功进行了南极第一例输血,随后把他转移到了飞机上。与此同时,飞行员保持发动机运转,因为引擎一旦过冷就再也发动不起来了。
努特皮姆表示,由于情况难以预料,他们的计划也很粗略。他的策略是“随机应变,恰当处理”。
史密斯和同事们在采访过探险队员后发现,自信要比太详尽的计划重要得多。他说:“然后就是要灵活处理随机应变,要根据事态发展相机行事。有许多事情是你无法控制的,能接受这一点也很重要。”
睡眠严重不足
训练有素、尽职尽责、满怀信心,即使具备了这三点,也无法忽略可能是救援任务中最大的挑战:飞行48小时所造成的睡眠严重不足。努特皮姆说任务中他一共就睡了四个小时,还说“他已经不是自己了”。
闭目养神不到半分钟的微睡眠有助于恢复体力。美国华盛顿州立大学睡眠与表现研究中心的主任凡·东恩(Hans Van Dongen)说:“不能好好睡觉的时候,大脑会通过短暂休息来补充睡眠。”
但是微睡眠也会分散注意力,影响各种表现——一个人如果刚好在开车就很可能发生车祸。
在返回智利的长途飞行中,努特皮姆异常疲惫,甚至都忘了医学知识,也无法下医疗决断。这很危险,因为罗伯茨的情况需要时时监控,需要重要的医疗决定。例如在罗瑟拉基地附近时,飞机需要高海拔飞行以越过高大的山体,但是罗伯茨由于失血体内的血液循环量很低,要考虑如果不输血,他的血量能够承受多长时间的高海拔飞行。
即便如此,英国急诊医学顾问努特皮姆还是同飞行员和工程师一起,飞赴南极。
他们是为了救助基地里一位生命垂危的患者。几天前,在哈雷研究站(Halley Research Station)工作的英国南极调查局工程师罗伯茨(Malcolm Roberts)肠胃严重出血,而最近的医院却在数千英里以外。
罗伯茨失血很多,但所幸挺过了前24小时。如果救援队伍能够及时赶到,那么他还有一线生机——但是前往南极的路道阻且长,很难说罗伯茨能不能逃过一劫。
冰冻坟场:南极洲死者的伤心故事
我们探险的动力是什么?
飞往哈雷研究站大约需要24小时,中途经停南极半岛的罗瑟拉基地(Rothera)加油。再加上回程,总共需要连续飞行48小时之久。返程途中还要应对患者的紧急状况,几乎没有时间休息睡觉。
单是拯救患者生命就已经不简单了,而与此同时,努特皮姆能否做好这次任务的心理准备?
最初并不是要派努特皮姆去,他只是后备医生,紧急救助开始后他飞到了智利最南端的蓬塔阿雷纳斯镇,按照计划是等救援飞机在那里着陆后提供协助。
但是,小镇以北的火山爆发,一切计划都被打乱。主治医生当时正在圣地亚哥等候转机,但所有航班都取消了。而智利南部与南极洲之间的德雷克海峡却出现了难得的好天气,海上能见度很理想。努特皮姆说:“我突然意识到该我去了,这是个千载难逢的好机会。”
事发突然,他承认当时甚至无暇思考可能发生的危险,只记得对前往南极救援激动无比。
极限探险者的品质
在南极冬天进行的医疗撤离屈指可数。2016年曾在24小时不见太阳的极夜里用飞机接走过一名病人,另一次是2010年从美国的研究主基地接走的。
英国曼彻斯特大学的心理学研究员史密斯(Nathan Smith)表示,参加极限探险的人通常是想要尝试大多数人所做不到的事情。他说:“这些人往往训练有素,因而将这当成是一次检验技能并尝试新任务的机会。”
面对极限探险的压力时,某些性格类型的人会更加自如。有研究显示,神经没那么敏感的人表现得更好。史密斯说:“我们发现,从事高危工作的人更不容易焦虑,即使焦虑也能控制好。”
这也与负责心有关。例如,一项研究调查了愿意尝试飞机抛物线飞行的人有哪些性格特质,结果发现责任心能让他们更好地应对极端的要求。人们普遍认为敢于尝试极限活动的人玩的就是心跳,但这项研究的结论恰好相反。史密斯说:“我们发现,这些人常常会花很多时间来降低风险,会尽力避免肾上腺素飙升,因为他们觉得这是一个危险信号。”
此次漫长的旅程中,努特皮姆和团队必须积极应对各种困难。譬如,努特皮姆需要全程监控血袋的温度,确保它处于有限的最佳温度范围之内。大家都挤在较为温暖的机头,机尾的温度则低至零下10摄氏度。他说:“我得找个合适的地方放置血袋,而且每小时都要检查一次。”
破晓时分,援救团队成功抵达哈雷基地,有一个半小时的时间将罗伯茨运上飞机,再晚天就黑得无法起飞了。气温已经到了零下30摄氏度,寒风将体感温度降得更低。努特皮姆坐着雪地摩托抵达基地,并在罗伯茨身上成功进行了南极第一例输血,随后把他转移到了飞机上。与此同时,飞行员保持发动机运转,因为引擎一旦过冷就再也发动不起来了。
努特皮姆表示,由于情况难以预料,他们的计划也很粗略。他的策略是“随机应变,恰当处理”。
史密斯和同事们在采访过探险队员后发现,自信要比太详尽的计划重要得多。他说:“然后就是要灵活处理随机应变,要根据事态发展相机行事。有许多事情是你无法控制的,能接受这一点也很重要。”
睡眠严重不足
训练有素、尽职尽责、满怀信心,即使具备了这三点,也无法忽略可能是救援任务中最大的挑战:飞行48小时所造成的睡眠严重不足。努特皮姆说任务中他一共就睡了四个小时,还说“他已经不是自己了”。
闭目养神不到半分钟的微睡眠有助于恢复体力。美国华盛顿州立大学睡眠与表现研究中心的主任凡·东恩(Hans Van Dongen)说:“不能好好睡觉的时候,大脑会通过短暂休息来补充睡眠。”
但是微睡眠也会分散注意力,影响各种表现——一个人如果刚好在开车就很可能发生车祸。
在返回智利的长途飞行中,努特皮姆异常疲惫,甚至都忘了医学知识,也无法下医疗决断。这很危险,因为罗伯茨的情况需要时时监控,需要重要的医疗决定。例如在罗瑟拉基地附近时,飞机需要高海拔飞行以越过高大的山体,但是罗伯茨由于失血体内的血液循环量很低,要考虑如果不输血,他的血量能够承受多长时间的高海拔飞行。
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