Wednesday, May 8, 2019

लोकसभा चुनाव 2019: निर्भया के माता-पिता पूछ रहे हैं, 'क्यों वोट दें? किसके लिए वोट दें?'

कुंवर नारायण की लिखी कविता की ये पंक्तियां तीन-चार बार पढ़िए और सामूहिक बलात्कार से जूझने वाली किसी महिला का रेखाचित्र ख़ुद-ब-ख़ुद आपकी आंखों के सामने आ जाएगा.

यहां कुंवर नारायण सामूहिक बालात्कार के होने को 'पूरे समाज का गुनहगार होना' बता रहे हैं और उनकी इसी बात को दुहरा रहे हैं 'निर्भया' के माता-पिता.

निर्भया. हां, वही निर्भया. 23 साल की वो लड़की जिसके साथ 16 दिसंबर, 2012 की रात को भारत की राजधानी दिल्ली में एक चलती बस में छह पुरुषों ने सामूहिक बलात्कार किया था.

किसी एक बलात्कार की दूसरे बलात्कार से तुलना नहीं की जा सकती. सभी बलात्कार अपने आप में बर्बर और जघन्य होते हैं लेकिन कई बलात्कार ऐसे होते हैं जिनकी बर्बरता को भारतीय क़ानून की जटिल भाषा में 'रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर' यानी 'जघन्यतम अपराध' कहा जाता है.

बलात्कार के ऐसे मामलों में अपराधियों के लिए फांसी की सज़ा का प्रावधान भी है. बलात्कार के मामलों में फांसी की सज़ा कितनी कारगर है, ये एक अलग बहस का मुद्दा है. वैसे भी जब मैं निर्भया के माता-पिता से मिलने उनके दो कमरों के फ़्लैट में घुसी तो ये बहस और तकनीकी सवाल मेरे ज़हन से लगभग ग़ायब हो चुके थे.

मेरा ध्यान बस उन कमरों के पर्दों, कमरों में लगी ट्यूबलाइट की मद्धिम और फीकी रोशनी सी मुस्कान लिए निर्भया की मां आशा देवी के चेहरे पर था. शाम के तक़रीबन पांच बजे होंगे और वो किचन में थीं.

दीवार पर शीशे की एक बड़ी शेल्फ़ लगी थी. शेल्फ़ में ढेरों ट्रॉफ़ियां, मोमेंटो और तस्वीरें थीं. एक तस्वीर निर्भया की मां और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात की भी थी. एक बोर्ड पर निर्भया मामले से जुड़ी ख़बरों वाले अख़बारों की कतरनों को सलीक़े से लगाया गया था.

निर्भया से जुड़ी इतनी चीज़ें घर में रखकर भला उसे भूल पाना कैसे मुमकिन होगा? मैंने ये बेवक़ूफ़ी भरा सवाल ख़ुद से पूछा और जवाब भी ख़ुद को ही दिया-ये चीज़ें घर में न होती तो क्या मां-बाप का दिल उसे भूला देता?

भावनाओं के इस समंदर से किसी तरह पार होते हुए मैंने आशा देवी और बद्रीनाथ से वो सवाल किया जिसका जवाब जानने के मक़सद से मैं उनके घर तक गई थी.

सवाल सुनकर आशा देवी ने रुंधी हुई आवाज़ में बोलना शुरू किया, "उस बच्ची को हमने अपने सामने एक-एक सांस छोड़ते देखा है. मरने से पहले उसे एक बूंद पानी तक नसीब नहीं हुआ. मांगती भी थी पानी, कहती थी प्यास लगी है...लेकिन नहीं दिया जाता था...सरकारें बदल गईं लेकिन हम उसी एक इंसाफ़ के लिए दौड़ रहे हैं. हमने परेशान होकर ये फ़ैसला लिया. कहा जाता है कि वोट देना हमारा अधिकार है...तो हमारा भी तो अधिकार है कि हमें इंसाफ़ मिले. हमने पांच साल तक बड़े धैर्य से इंतज़ार किया. हमें भरोसा था कि हमें इंसाफ़ मिलेगा लेकिन अगर महिलाओं की दुर्गति देखें तो आज भी हम 2012 में खड़े हैं."

निर्भया के पिता बद्रीनाथ अपनी पत्नी की बात आगे बढ़ाते हैं, "उस समय कहा जा रहा था कि अच्छे दिन आने वाले हैं, लेकिन हमारे लिए तो वही दिन और वही रात रह गए, अच्छे दिन तो आए ही नहीं. किसी ने हमसे कहा भी था कि ईवीएम में जगह होती है बटन दबाने के लिए, नोटा की, कि हम इन उम्मीदवारों का बहिष्कार करते हैं लेकिन हमने कहा कि हमें वहां जाने की ज़रूरत ही क्या है? हम धूप में क्यों जाएं वोट देने? हम अपने घर में रहेंगे. वोट नहीं देना है तो नहीं देना है."

उनके वोट न देने से किसी पार्टी या नेता को कोई फ़र्क़ पड़ेगा? इस बारे में बद्रीनाथ और आशा देवी दोनों की राय अलग है.

आशा देवी निराशा भरे स्वर में कहती हैं, "इतनी बच्चियां मर रही हैं, इतने क्राइम हो रहे हैं. किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता तो हमारे एक वोट न देने से उनको क्या फ़र्क़ पड़ेगा?"

अपनी पत्नी के उलट बद्रीनाथ के मन में अब भी थोड़ी सी उम्मीद बाक़ी है. उन्होंने कहा, "मेरी बेटी के बारे में दुनिया जानती है. मीडिया वाले हमारे पास आ रहे हैं, हमसे बात कर रहे हैं तो धीरे-धीरे बात उन तक भी पहुंचेगी. इसका कुछ न कुछ असर तो ज़रूर होना चाहिए."

दोनों की बात सुनते-सुनते मैंने दिल कड़ा करके उनसे एक और सवाल पूछा, "सुप्रीम कोर्ट ने तो सभी अपराधियों को फांसी की सज़ा सुना दी है. ऐसे में आपकी शिकायत किससे है? सरकार से? नेताओं से? राजनीतिक पार्टियों से या फिर न्याय व्यवस्था से?"

जवाब निर्भया के पिता देते हैं.

बड़े ही साफ़ लहजे में वो कहते हैं, "मेरी शिकायत किसी से नहीं है और शिकायत सबसे है. शिकायत सबसे इसलिए है क्योंकि किसी पार्टी ने अपने मेनिफ़ेस्टो में नहीं कहा है कि हम लड़कियों की सुरक्षा करेंगे...और वैसे देखेंगे तो पर्सनली हमें किसी से शिकायत नहीं है. रही बात हमारी बेटी की तो इतने बड़े मामले में जब सात साल के बाद अपराधियों को सज़ा नहीं हुई तो बाक़ी मामलों में हम क्या उम्मीद कर सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आ गया लेकिन अब भी हम अपनी लड़ाई लोवर कोर्ट में ही लड़ रहे हैं. इंसाफ़ मिलने की भी कोई समय सीमा होती है या नहीं?"

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