Tuesday, January 15, 2019

कर्नाटक में ऑपरेशन लोटस 3.0 शुरू, अब क्या होगा?

भारतीय जनता पार्टी कर्नाटक में जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) और कांग्रेस की गठबंधन सरकार को तोड़ने के प्रयास पहले भी कर चुकी है. ऑपरेशन कमल 3.0 इन प्रयासों से अलग नहीं है.

कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे 15 मई को आए थे और उस दिन के बाद से ही बीजेपी असंतुष्ट कांग्रेसी विधायकों को अपनी ओर खींचने के प्रयास करती रही है.

और असंतुष्ट कांग्रेसी विधायकों ने भी मंत्रीपद या अहम स्थान न मिलने की स्थिति में पाला बदलने की मंशा ज़ाहिर करने में कोई हिचक नहीं दिखाई है. वो रह-रह पार्टी आलाकमान को संकेत देते रहे हैं.

2008 में कर्नाटक में जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई थी तब पार्टी नेताओं ने बहुमत हासिल करने के लिए ऑपरेशन कमल की तरकीब इजाद की थी. 224 सदस्यों की विधानसभा में भाजपा को 110 सीटें मिलीं थीं. वो बहुमत से दो सीट दूर थी.

बहुमत हासिल करने के लिए बीजेपनी नेतृत्व ने तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के मार्गदर्शन में कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों को अपनी ओर खींचा. विधायकों ने निजी कारण बताकर इस्तीफ़े दिए थे.

विधायक पद से इस्तीफ़ा देने के बाद भाजपा ने इन विधायकों को अपने टिकट दिए और ये चुनकर फिर से सदन में पहुंच गए. ऑपरेशन कमल में हिस्सा लेने वाले आठ विधायकों में से पांच ही जीतने में कामयाब रहे. बाक़ी तीन को मतदाताओं ने हरा दिया. ये ऑपरेशन कमल 1.0 था.

केंद्र में सत्ताधारी भाजपा मोदी लहर में राज्य में सत्ता तक पहुंचने के लिए आश्वस्त दिख रही थी. लेकिन ये जोश तब ठंडा पड़ गया जब रुझानों में भाजपा 108 से ऊपर का आंकड़ा नहीं पकड़ सकी और अंततः पूरे नतीजे आने तक 104 सीटों पर जाकर रुक गई.

80 विधायक लाने वाली कांग्रेस ने 37 विधायक लेकर आई जनता दल सेक्यूलर को सरकार बनाने का न्यौता देकर सबकों चौंका दिया. एचडी कुमारास्वामी को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया. दोनों पार्टियों की संख्या को मिलाकर गठबंधन के पास कुल 117 सीटें हो गईं यानी बहुमत से पांच ज्यादा.

बावजूद इसके राज्यपाल वाजूभाई वाला ने गठबंधन को नज़रअंदाज़ करके सबसे ज़्यादा सीटें लाने वाली भाजपा के येदियुरप्पा को सरकार बनाने का न्यौता दे दिया. येदियुरप्पा को बहुमत साबित करने के लिए पंद्रह दिनों का समय दिया गया. लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और पंद्रह दिनों का समय करके एक दिन कर दिया गया.

कांग्रेसी और जेडीएस के विधायकों को लुभाने के लिए भाजपा ने सभी प्रयास किए. सत्ता और पैसे का लालच दिया गया. एक ओर विधानसभा में विश्वास मत पर बहस शुरू हुई तो दूसरी ओर कांग्रेस ने अपने विधायकों को ख़रीदने की कोशिश के ऑडियो टेप जारी कर दिए. इनमें दावा किया गया कि कांग्रेसी विधायकों को बीजेपी के ताक़तवर नेताओं ने ख़रीदने की कोशिश की.

येदियुरप्पा ने विश्वास मत पर मतदान होने से पहले एक भावुक भाषण में अपने इस्तीफ़े की घोषणा कर दी और राजभवन की ओर चले गए. राज्यपाल ने एचडी कुमारास्वामी को सरकार बनाने और बहुमत साबित करने का न्यौता दिया.

चर्चाएं चलती रहीं कि अपने भाई रमेश जार्कीहोली को मंत्री बनाए जाने से नाराज़ सतीश जार्कीहोली पाला बदलकर बीजेपी में जा सकते हैं. लेकिन सतीश जार्कीहोली ने साफ़ कर दिया कि उनका कांग्रेस पार्टी को छोड़ने का कोई इरादा नहीं है.

बीजेपी नेता दावा करते रहे कि कांग्रेस और जेडीएस की सरकार ज़्यादा दिनों तक नहीं चल पाएगी और लोकसभा चुनावों से पहले गिर जाएगी. कांग्रेस भी मंत्री बनने की चाह रखने वालों की भावनाओं को शांत करती रही. कांग्रेसी विधायक जेडीएस के मंत्रियों के अपने काम न करने को लेकर नाराज़गी ज़ाहिर करते रहे. बीजेपी ने स्थिति पर क़रीबी नज़र बनाए रखी.

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